‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय
—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (प्रयागराज)
कोरोना-काल अभी समाप्त नहीं हुआ है। वास्तव में, जो कोरोना योद्धा हैं, उनका कहीं-कोई सम्मान नहीं और जो ‘छद्म’ कोरोना योद्धा हैं, उन्हें नाना मंचों से सम्मान दिये जा रहे हैं। ठीक वही स्थिति ‘मुक्त मीडिया’ के उन लोग की है, जिन्होंने ऐसा एक भी काम नहीं किया है, जिसके आधार पर उन्हें ‘कोरोना योद्धा’ कहा जाये; परन्तु कुछ संस्थाओं में ऐसे बुद्धिहीन महिला-पुरुष पदाधिकारी हैं, जो अनावश्यक रूप से कुछ लोग को ‘कोरोना योद्धा’ बना, ‘वास्तविक’ कोरोना योद्धाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते आ रहे हैं। यदि उन सभी पर जाँच बैठा दी जाये तो सभी “हमाम में नंगे” दिखेंगे। इसी तरह से कुछ महिलाओं और पुरुषों को, जिन्हें न छन्दविधान की समझ, न बिम्ब-प्रतीक-योजना की परख, न शब्दशक्ति की सामर्थ्य और न ही शब्दानुशासन का संज्ञान है, उन्हें ‘महाकवयित्री’, ‘महाकवि’ आदिक उपाधियों से विभूषित कर “एक हाथ से लो-दूसरे हाथ से दो” को चरितार्थ किया जाता है। ऐसी ही महिलाएँ स्वयं को ‘कबित्री’, ‘कवित्री’, ‘कवियित्री’, ‘कवियत्री’ बताती और लिखती आ रही हैं और पुरुष अपने को ‘कबि’ कहता आ रहा है।
यह धिक्कारपत्र उन संस्थाओं के पदाधिकारियों के लिए है, जो ‘गान्धारी’ और ‘धृतराष्ट्र’ बनकर अपात्र और कुपात्र लोग को ‘मुक्त मीडिया-पटल’ (सोसल मीडिया) पर ‘कोरोना योद्धा’ का प्रमाणपत्र बाँटकर वाह-वाही लूट रहे हैं।
आश्चर्य है, जो महिला-पुरुष ‘कोरोनाकाल’ में कोरोनाग्रस्त रोगियों और घर लौट रहे लाचार प्रवासियों की सहायता करने अथवा घर से बाहर निकलकर किसी भी ज़रूरतमन्द की संवेदना को बाँटने में भय का अनुभव करते आ रहे हैं, वे लोग भी यहाँ ‘सीना ठोंककर’ कुपात्रों-द्वारा बाँटे गये कथित कोरोना योद्धा के प्रमाणपत्र को सीने और माथे पर चिपका कर प्रदर्शित करते आ रहे हैं। उक्त प्रकार के प्रमाणपत्रों पर अनधिकृत संस्था-पदाधिकारियों- द्वारा अपने नाम और हस्ताक्षर अंकित कर, अपात्रों-कुपात्रों को पंजीरी की तरह से ‘अवैध’ प्रमाणपत्र बाँटने का औचित्य क्या है?
मेरे पास भी कुछ लोग का वैसा प्रस्ताव आया था; परन्तु मेरा उनसे प्रश्न था– मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया है, जिसके आधार पर आप मुझे ‘कोरोना योद्धा’ प्रमाणित करना चाहते हैं? इस पर किसी का भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला था। यद्यपि वे लोग मुझसे प्रसन्न नहीं हैं तथापि मेरे लिए कोई अन्तर नहीं। मैं अपने ‘पुरुषार्थ’ पर विश्वास करता हूँ, फिर आप क्यों नहीं?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ जुलाई, २०२० ईसवी)