— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इस्लाम-सम्प्रदाय को माननेवाले राष्ट्रगायन न करने के प्रति आग्रहीजन!
दशकों से यह तथ्य संज्ञान कराता आ रहा है कि आप लोग को निम्नांकित ‘राष्ट्रगान’ में सम्मिलित किन्हीं दो शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति है, जिनके कारण आप सभी ‘राष्ट्रगान-गायन’ करने के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते आ रहे हैं।
आप सभी किसी के भ्रमित करने पर अपनी आँखें बन्द न कर लें; क्योंकि राष्ट्रगान की इन पूरी पंक्तियों में ऐसा एक भी शब्द नहीं है, जिसको गाने से आपका ‘इस्लाम-सम्प्रदाय’ ख़तरे में पड़ जाये। यहाँ मैं ‘राष्ट्रगान’ का विरोध करनेवाले सभी लोग को निमन्त्रित करता हूँ कि वे मुक्त भाव के साथ शालीनतापूर्वक अपनी तर्कसंगत प्रतिक्रिया करें; संवाद करें; क्योंकि किसी भी विवाद को निबटाने के लिए संवाद उत्कृष्ट माध्यम होता है। मैं सबको उनकी साम्प्रदायिक भावना का सम्मान करते हुए, अपने तर्क और तथ्य से निरुत्तर कर दूँगा, वचनबद्ध होता हूँ।
मैंने यहाँ उसी ‘राष्ट्रगान’ को अंकित किया है, ताकि ‘राष्ट्रगान-गायन’ करने के विरोधी लोग इसके एक-एक शब्द पर दृष्टि-निक्षेप करते हुए, अपना ‘मन-परिवर्त्तन’ कर, ‘राष्ट्रवाद’ का समादर कर सकें। ‘
‘अधिनायक’ (अनियन्त्रित) और ‘भाग्य-विधाता’ (भाग्य की व्यवस्था करनेवाला) हमारा यह ‘राष्ट्रध्वज’ है। ये दोनों शब्द ‘राष्ट्रीय गरिमा’ के प्रतीक हमारे इस चक्रयुक्त त्रिवर्णीय ध्वज के लिए है, जो हमारे राष्ट्रीय अभिमान का प्रतीक है। यह ध्वज निरंकुश और अनियन्त्रित होकर भारतीयता के भाग्यप्रसाद का वितरण कर रहा है और हम करतल-ध्वनि से उसका अभिनन्दन कर रहे हैं।
हाँ, आप राष्ट्रगायन करें अथवा न करें, यह आपके सकारात्मक और पूर्वग्रहरहित चिन्तन का विषय है, जिसके लिए आप स्वतन्त्र हैं; क्योंकि आपके गायन न करने से हमारा राष्ट्रधर्म विचलन के पथ पर नहीं है, वह तो शाश्वत-चिरन्तन है, जो संचलनपथ से सम्पृक्त (सम्बद्ध, जुड़ हुआ) होकर ‘चरैवेति-चरैवेति’ का प्रसाद बाँट रहा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ अगस्त, २०२० ईसवी।)