नेह की यज्ञवेदी सजाकर प्रिये!
सब हविष् के लिए खोजने तन चले।
मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,
कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।।
आस-विश्वास के आसनों के तले,
ज्ञान-विज्ञान सारे दबे रह गये।
मन को स्थिर किये बैठे विनियोग को,
मार्जनी बन कलश में पड़े रह गये।।
कामनाओं के अक्षत समेटे हुए,
हम तपिश के लिए ढूँढने घन चले।
मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,
कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।।
गंगाजल -सी लगी भावना प्रेम की,
आचमन में अधर चूमते रह गये।
नेह की मुद्रिका को पवित्री समझ,
भाग्य के भाग्य पर झूमते रह गये।।
प्रेम-समिधा में ना आखिरी आहुति,
युग-युगान्तर जले चुनने सुमन चले।
मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,
कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।।
लोध्र के रंग से सुवासित कोंपलें ,
रश्मि के अंकुरण से दमकने लगे।
नवग्रह में तुम्हारी छवि देखकर,
कण्ठ स्वयं स्वस्ति-वाचन करने लगे।।
सीपियों-सी तृषा हम हृदय में लिए,
प्रेम-अमृत नहाने को मधुबन चले।
मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,
कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।।
©जगन्नाथ शुक्ल…✍️
(प्रयागराज)
