★’उत्तरप्रदेशलोक सेवा आयोग’ के दामन पर कब तक लगता रहेगा दाग़?
★ आर०ओ०-ए०आर०ओ० के सामान्य हिन्दी/व्याकरण के प्रश्नपत्र में अशुद्धियाँ-ही-अशुद्धियाँ!
एक अर्से से उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग बदनामी की चादर ओढ़े हुए है। प्रतियोगी विद्यार्थियों का भविष्य नष्ट हो तो हो, ठेंगे से। वे विद्यार्थी आयोग की लापरवाही का शिकार होकर इस न्यायालय से उस न्यायालय तक का चक्कर लगाते-लगाते बूढ़े हो जायें, फिर भी आयोग को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम समय-समय पर आयोग के ज़िम्मेदार लोग के कान उमेठते आ रहे हैं; परन्तु लज्जा ऐसी ‘बेशर्म’, जो कि आती ही नहीं। रविवार को आर०ओ०- ए०आर०ओ० की परीक्षाएँ करायी गयीं। आयोग को यही नहीं मालूम कि वह परीक्षाएँ ‘आर०ओ०’ की करा रहा है अथवा ‘ए०आर०ओ०’ का, तभी तो वह दशकों से अपनी परीक्षा का नाम ‘आरओ/एआरओ’ लिखता आ रहा है, जबकि दोनों पदों के लिए एक ही परीक्षा होती है और प्रश्नपत्र भी एक ही होता है। ऐसे में, उसे इस परीक्षा का नाम ‘आर० ओ०- ए० आर० ओ०’ रखना चाहिए। कक्षा छ: में ही पढ़ाया गया है कि (/) यह चिह्न ‘अथवा’ का है और (-) यह चिह्न ‘और’ का। इस आयोग में एक-से-बढ़कर पढ़े लिखे लोग होंगे; परन्तु अफ़सोस! आयोग को सामान्य हिन्दी के प्रश्नपत्र में प्रश्न करने का ढंग तक नहीं मालूम। इतना ही नहीं, इसी प्रश्नपत्र में एक शब्द ‘मीमांसा’ का अर्थ बताने के लिए एकल उद्धरणचिह्न (‘ ‘) का प्रयोग किया गया है तो युगल उद्धरणचिह्न का प्रयोग कर “चारित्रिक” का भी। आयोग को यही ज्ञान नहीं कि कहाँ एकल उद्धरणचिह्न (‘ ‘) लगता है और कहाँ युगल उद्धरणचिह्न (” “)। यहाँ एक प्रकार से परीक्षार्थियों को भ्रमित किया गया है। एक प्रश्न में ‘आभ्यन्तर’ को तत्सम शब्द बताते हुए, उसका तद्भव पूछा गया है और उसका शुद्ध उत्तर ‘भीतर’ बताया गया है। ‘भीतर’ शब्द तभी शुद्ध माना जाता जब ‘आभ्यन्तर’ के स्थान पर ‘अभ्यन्तर’ होता, जिसकी रचना ‘अभि+अन्तर’ से हुई है। ऐसे में, आयोग ने हमारे विद्यार्थियों के लिए न्यायालय जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। जब भी कोई प्रश्न किया जाता है तब उसके प्रश्नात्मक वाक्य होने पर प्रश्नवाचकचिह्न (?) लगाया जाता है और जब प्रश्न सकारात्मक वाक्य में रहता है तब विवरणचिह्न (:–) का प्रयोग होता है, जबकि आयोग ने पूरी तरह से लापरवाही बरतते हुए, ‘सामान्य हिन्दी’/ ‘व्याकरण’ की परीक्षा कराने के नाम पर व्याकरण के साथ क्रूर छल किया है। एक प्रश्न है– ‘विलोम की दृष्टि से इनमें से सही युग्म है’ इस ‘युग्म है’ के आगे कोई विरामचिह्न नहीं लगाया गया है, जबकि यहाँ प्रश्न के अन्त में विवरणचिह्न (:–) लगेगा; क्योंकि नीचे चार विकल्पों के रूप में उनके विवरण दिये गये हैं। ऐसे में, यह प्रश्नात्मक वाक्य ही अशुद्ध है। इस तरह से कुल ६० प्रश्नों में से ४३ प्रश्न ऐसे हैं, जो शुद्ध प्रश्नात्मक वाक्य हैं ही नहीं।
आयोग ने उत्तर भी जारी कर दिया है। सीरीज़ ‘बी’ के प्रश्नपत्र में ९ वें में विशेषण-शब्द ‘मानसिक’ का मूल शब्द ‘मानस’ बताया गया है, जो कि अशुद्ध है; शुद्ध मूल शब्द ‘मानस्’ है। ५४ वें और ५५ वें प्रश्न के विकल्प ग़लत दिये गये हैं। ५४ वें में शुद्ध वाक्य पूछा गया है, जबकि चारों विकल्प अशुद्ध हैं। आयोग ने जिस वाक्य को शुद्ध बताया है, उसमें ‘बावजूद’ शब्द अशुद्ध है, शुद्ध शब्द ‘बावुजूद’ है, जो कि फ़ारसी-भाषा का ‘अव्यय’ शब्द है, जो ‘बा+वुजूद’ से बना है। इसी वाक्य में ‘हम लोगों’ का प्रयोग भी अशुद्ध है, शुद्ध शब्द ‘हम लोग’ है। बहुवचन का ‘बहुवचन’ नहीं बनता। क्या ‘आयोगों’ का बहुवचन बनेगा? ५५ वें प्रश्न में अशुद्ध वाक्य-चयन करने के लिए कहा गया है और आयोग-द्वारा जारी उत्तर के अनुसार (डी) को शुद्ध बताया गया है, जबकि इस प्रश्न के अन्तर्गत दिये गये दो विकल्प अशुद्ध हैं। ऐसे में, किसे शुद्ध उत्तर कहा जायेगा? इसका (ए) विकल्प है– पुलिस द्वारा डाकुओं का पीछा किया गया। इस वाक्य में ‘पुलिस द्वारा’ अलग-अलग दिया गया है, जिसका व्याकरण के आधार पर कोई अर्थ नहीं निकलता; क्योंकि ‘पुलिसद्वारा’ अथवा ‘पुलिस-द्वारा’ लिखा जायेगा, तभी इसका अर्थ ‘पुलिस के द्वारा’ होगा, इसीलिए ‘उसके द्वारा’ कहा जाता है, न कि ‘उस द्वारा’। ‘द्वारा’ का प्रयोग करते समय ‘के’ का आश्रय लिया जाता है। इस प्रश्न का विकल्प डी भी अशुद्ध है। उस वाक्य में ‘कोई न कोई’ का प्रयोग किया गया है, जबकि ‘कोई-न-कोई’ होगा; क्योंकि ये शब्दप्रयोग सदैव एक साथ होते हैं, इसलिए योजकचिह्न (-) का प्रयोग उन्हें एक साथ जोड़े रखता है। इसी तरह का एक अन्य प्रयोग देखें– कभी-न-कभी। इस व्याकरणिक आधार पर हमारे विद्यार्थियों का पक्ष सुदृढ़ हो जाता है। प्रश्नों में अन्तिम विकल्प के रूप में ‘इनमें से कोई नहीं’ और ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’– ये प्रयोग पूर्ण वाक्य के रूप में हैं। ऐसे में, इन वाक्यों के अन्त में पूर्ण विरामचिह्न लगेगा, जबकि आयोग ने इसे ज़रूरी नहीं समझा है।
इस प्रश्नपत्र के अन्तर्गत प्रश्न निर्धारित करने के लिए उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग के जिन अधिकारियों ने ‘प्राश्निक’ के रूप में जिनका चयन किया है, उनको कक्षा ६ से ८ तक के भाषा-व्याकरण की पढ़ाई करनी होगी और जिसने प्रश्नपत्र बनाया है, वह बेचारा ‘दया’ का पात्र है।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री को इस दिशा में गम्भीर क़दम उठाने होंगे, अन्यथा उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग के सम्बद्ध अधिकारी भाषाप्रदूषण करते हुए, घृणित कीर्तिमान बनाते रहेंगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ सितम्बर, २०२० ईसवी।)