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मातृभाषा में शिक्षण करना हस्तामलक नहीं– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नेहरू ग्रामभारती मानित विश्वविद्यालय और केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का संयुक्त राष्ट्रीय आयोजन

★ प्रस्तोता– राघवेन्द्र कुमार राघव (सम्पादक आईवी24, अवध रहस्य साप्ताहिक)

“पैदा होने के बाद शिशु जो कुछ भी उच्चारित करता है, वह उसकी ‘मातृभाषा’ कहलाती है; वह भाषा उसके परिवेश में रची-बसी रहती है। यही कारण है कि मनोविज्ञानी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। यह स्वीकृति अनायास नहीं है; क्योंकि मातृभाषिक शिक्षा बच्चों में पारिवारिक और सामाजिक संस्कार सम्पूरित तो करती ही है, उसे संकल्पनात्मक भाव और विचार से सम्पृक्त भी करती है। ऐसी स्थिति में, वह बच्चा अपनी भूमि और संस्कृति के साथ रागात्मक और भावात्मक सम्बन्ध स्थापित कर ‘सायुज्य’ रूप प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार वह ‘अभेद’ की गोद में बैठ जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मातृभाषा में शिक्षण करना ‘हस्तामलक’ नहीं है।”

उद्घाटन-सत्र में मंचस्थ विद्वज्जन :– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रो० सुरेशचन्द्र तिवारी, प्रो० शीलप्रिय त्रिपाठी, प्रो० राममोहन पाठक, उदय प्रताप सिंह, प्रो० के० के० तिवारी।

मुख्य अतिथि के रूप में भाषाविद्, भाषाविज्ञानी तथा वैयाकरण आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने ‘नेहरू ग्रामभारती मानित विश्वविद्यालय’, प्रयागराज और ‘केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में विश्वविद्यालय-सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘शिक्षण का माध्यम : मातृभाषाएँ’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किये थे। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षित करने के मार्ग में आनेवाली व्याहारिक कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए कहा, “मातृभाषाओं में कोश का अभाव है और अन्य संसाधनों का भी; पहले उन अभावों की पूर्ति आवश्यक है।”

इससे पूर्व उद्घाटन-सत्र आरम्भ हुआ था, जिसमें मंचस्थ विद्वज्जन में नेहरू ग्रामभारती के कुलपति प्रख्यात पत्रकार, शिक्षाविद् प्रो० राम मोहन पाठक, हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष डॉ० उदय प्रताप सिंह, सम-कुलपति प्रो० सुरेशचन्द्र तिवारी, भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, नेहरू ग्रामभारती विश्वविद्यालय में कला-संकाय के अधिष्ठाता डॉ० शीलप्रिय त्रिपाठी आदिक शामिल थे। ऑन-लाइन माध्यम से प्रो० जे० एस० राजपूत, प्रो० कट्टिमनी, श्रीप्रकाशमणि त्रिपाठी की सहभागिता थी। विश्वविद्यालय-परिवार की छात्र-छात्राओं ने सुमधुर ईशवन्दना और कुलगीत प्रस्तुत किये थे।

नेहरू ग्रामभारती विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो० जे० एन० मिश्र ने अपने आशीर्वादात्मक उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, “नयी शिक्षा-नीति का विधिवत् क्रियान्वयन् किया जाना आवश्यक है। यह तभी सम्भव होगा, जब हम सभी को साथ लेकर चलेंगे। मातृभाषा की उपयोगिता को समझते हुए देश के समस्त जन को इस अभियान के साथ जुड़ जाना चाहिए।” प्रख्यात शिक्षाशास्त्री प्रो० जे० एस० राजपूत (एन०सी०ई०आर०टी०) ने कहा, “भाषा में समाज को मोड़ने की शक्ति होती है। विश्वस्तर पर शिक्षाव्यवस्था में अँगरेज़ी की प्रभुता रहती है, इसीलिए उसके समकक्ष भारतीय भाषाओं को लाया जा रहा है।” उद्घाटन-सत्र के मुख्य अतिथि प्रो० कट्टिमनी ने कहा, “हमारे देश में जितने भी प्रकार के कौशल हैं, उन्हें शिक्षानीति के साथ जोड़ना होगा, तभी मातृभाषा की उपयोगिता सिद्ध होगी।” मुख्य वक्ता डॉ० उदयप्रताप सिंह ने कहा, “जब तक हम हिन्दीभाषा के साथ प्रेम नहीं करेंगे, शिक्षानीति का कोई औचित्य नहीं है।” अध्यक्षता करते हुए श्रीप्रकाशमणि त्रिपाठी ने कहा, “भारतीय भाषाओं को व्यावहारिक धरातल पर लाने की आवश्यकता है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीयता प्रतिबिम्बित हो।”

उनके अतिरिक्त अखिलेश दुबे, डॉ० सपना, पवन तिवारी, सत्यपाल तिवारी आदिक ने अपने विचार व्यक्त किये थे।
आभार-ज्ञापन करते हुए कुलपति प्रो० राममोहन पाठक ने राष्ट्रीय संगोष्ठी-आयोजन कराने के औचित्य पर बहुविध प्रकाश डाला।