यह दुनिया फ़ानी है, क्यों डूबे अफ़्साने में

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

रहो एहतिराम से, क्या रखा है, फ़साने में,
यह दुनिया फ़ानी है, क्यों डूबे अफ़्साने में।
इस जहाँ में सब तो पाक़ीज़ा नहीं दिखते,
कुछ पापी भी हैं मेरे-जैसे, इस ज़माने में।
उदास निगाहों की खुमारी उतरती ही नहीं,
दीगर बात है, ख़ाली बोतल हैं मैख़ाने में।
उनका क़दम ठिठकता है, फिर बहकता भी,
मिलेगा गर सुकूँ तो अपने ही ग़रीबख़ाने में।
परिन्दा पयाम लेकर, मुँडेर पर अभी बैठा है,
मत रोको उसे, जाने दो अपने आशियाने में।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; प्रयागराज; १२ दिसम्बर, २०२० ईसवी।)