★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
भाइयों-बहनों-मितरों!
फोर ट्वेंटी वेब ४२० पर यह खोखलीवाणी का ८४० झूमरी तलय्या का ढपोरशंखी-केन्द्र है। मैं लफ़्फ़ाज पण्डित लफ़्फ़ाजी का पिटारा लेकर ख़ुदा को हाज़िर-नाज़िर जानकर दरवाज़ातोड़ हाज़िर हूँ।
जैसा कि देश-प्रदेश के वातावरण का पारा प्रतिक्षण ज्वार-भाटा की तर्ज़ पर बढ़-चढ़-घट आ रहा है। तो आइए, ताज़ा हालात का जाइज़ा लेते हैं :– उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड तथा दिल्ली में कुछ पारा लुढ़का तो है; परन्तु वह पारा कब सिर चढ़कर बोलने लगे, कहना, बताना, समझाना उतना आसान नहीं है जितना आम लोग सोचते-विचार करते हैं और मगज मारते रहते हैं। पहले ‘सेंसेक्स’ नामक जीव देश-दुनिया में फुदकता नहीं था, तब तो मौसम की गरमाई और ठण्ढाई का सेवन किया जाता था। अब तो अख़बार और टीह्वी पर ‘सेंसेक्स’ को अगराते, मन मसोसते, मर्सिया गाते हुए दिखाया-सुनाया-पढ़ाया जाता है। इतिहास में कभी पढ़ाया गया था और ‘मोस्ट इम्पॉर्टेण्ट क्वेश्चन’ भी होता था :– हुमायूँ जीवनभर लुढ़कता रहा और लुढ़कते-लुढ़कते मर गया। आज वह ऐतिहासिक प्रश्न प्रासंगिक दिख रहा है। कारण कि किसानों का ‘चक्काजाम-आन्दोलन’ देशभर में षोडशवर्षीया लावण्यमती सुन्दरी की तरुणाई-मानिन्द ऐसा आग फेंक रहा है कि बुझाते नहीं बुझती। ऐसी बात नहीं कि दमकल की व्यवस्था नहीं है। जब सरकार बहादुर किसानों का आन्दोलन पर खड़ी पाई लगाने के लिए और ‘पैरा’ बदलकर सरकार के बेसुर में सुर मिलाने के लिए ग़ाज़ीपुर बॉर्डर और अन्य स्थानों पर वैसी व्यवस्था करा दी है, जैसी कि दुनिया के किसी भी ‘अन्तरराष्ट्रीय बॉर्डर’ पर व्यवस्था नहीं है तब सरकार कितनी निर्दय और डरपोक है, समझाइश में बात अटक सकती है। इधर अन्नदाता अपनी वैधानिक माँग को लेकर जब “झण्डा ऊँचा रहे हमारा” का जयघोष कर रहे हैं उधर सरकार बहादुर अँगड़ाई लेने में भी कंजूसी कर रहे हैं। वे नींदे-नींद में आदेश बघार देते हैं और फर्राटा दौड़ दौड़ रहे किसानों के पैर-में-पैर फँसाने के लिए सड़कों पर सीमेण्ट में कीलें जड़वाकर और रक्षक के नाम पर बार-बार भक्षक सिद्ध होते रहे सुरक्षाकर्मियों को स्टील की तलवार थमाकर ज़िद्दी और मनबढ़ औलाद की भूमिका में दिख रहे हैं।
चीन भारत की सीमा में घुसकर दण्ड-बैठक पेल रहा है; पाकिस्तान आये-दिन युद्धविराम का दुरुपयोग कर हमारे जवानों को शहीद करता आ रहा है; परन्तु सरकार बहादुर नीरो की तरह से चैन की वंशी बजाते हुए रागिनी सुना रहे हैं। अपने इलाक़े में तो ससुर कुकुर भी ‘शेर’ बन जाता है।
हमारे मौसमविज्ञानी ऊखाड़ानन्द स्वामी ने अभी-अभी अपनी ‘आन्तरिक’ सूचना भेजी है कि उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड तथा दिल्ली में फ़िलहाल ठण्ढई का प्रकोप है; परन्तु उसे कब ‘निमोनिया’ धर पकड़े, कहना-बताना मुश्किल काम है। अलबत्ता हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों में सेंसेक्स उबाल पर है; तापमान थर्मॉमीटर के पारे पर चढ़ाई कर चुका है; तापमान सूरज महाराज को अँगूठा दिखाता नज़र आ रहा है। शत्रु-सेना उसकी आँच पर अपनी-अपनी दाल गलाने में जुट गयी है :– कोई अरहर की; कोई मसूर की; कोई मूँग की; कोई चने की; कोई मटर की; कोई उर्द। अनुमान है कि किसान-आन्दोलन जैसे ही दौड़ने के लिए अपने धावन-पथ पर पहुँचेगा, तापमान के सारे रिकार्डों की खालें हिलतीं नज़र आयेंगी। उधर, उत्तरप्रदेश उत्तराखण्ड का तापमान ८५ डिग्री तक पहुँच चुका है। वहाँ लोग उसकी आँच पर अपनी-अपनी केतली रखकर कोरोना से दो-दो हाथ करने के लिए ‘अवसरवादी चूल्हे पर’ ‘काढ़ा’ पकाने की इंतिज़ारी में हैं तो पंजा को गरमाने की होड़ में भी सट गये हैं।
भाइयों-बहनों-मितरों! इसी के साथ अब मेरा जाने का समय हो चुका है। मेरी लफ़्फ़ाजीगिरी कैसी लगी, आप सबकी प्रतिक्रिया सूँघने के लिए नयना तरस रहे हैं। जय जाति, जय धर्म, जय सम्प्रदाय, जय भाषा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ फरवरी, २०२१ ई०।)