बातें-जज़्बे

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ताल कितना मिला रहा, छटक रहा हर राग।
मिलता उत्तर भी नहीं, खेलूँ कैसे फाग।।
देवर-भाभी में कहाँ, भला दिखे अनुराग।
बाहर-बाहर प्रेम है, भीतर-भीतर आग।।
रस्सी लेकर सब जुटे, बढ़ा-बढ़ाकर बैर।
आँखें मन की बन्द हैं, नहीं किसी की ख़ैर।।
उलटा चश्मा आँख पर, दुनिया है विपरीत।
चोर दारोगा बन रहा, अजब-गज़ब की रीत।।
ककहरा की समझ नहीं, बाँट रहा उपदेश।
बैठा भक्त समझ रहा, नक़्ली उसका वेश।।
रूप-रंग औ’ गन्ध का, नहीं किसी को बोध।
छूता को न छूत लगे, दिखते सभी अबोध।।
राग-रंग उत्सव बना, मन दिखता है तंग।
छूता तन को तन कहीं, मन से मन ले रंग।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ मार्च, २०२२ ईसवी।)