देश की सरकार की भाषा-दरिद्रता

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

”अक़्ल का अन्धा” हमारे देश में बहुविध चरितार्थ हो रहा है और उसे वह सरकार कर रही है, जो भेड़-चाल चल रही देश की अधिकतर जनता को ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ का भावनात्मक सोमरस पिला-पिला कर स्ववश मे किये हुए है। यही कारण है कि ‘सरकार साहेब’ जो भी उगल देते हैं, उसे हाथों-हाथ लेनेवाले चक्षु-सहित मानसिक स्तर पर ‘नेत्र-विहीन’ दिव्यांगजन, अर्थात् अपनी असमर्थता के सम्मुख पराजित होकर अपनी स्वाभाविक निर्लज्जता को इस प्रकार से प्रकट करते आ रहे हैं, मानो उनकी चिर-संचित अभिलाषा ब्याही जा रही हो।

देश की वर्तमान सरकार ‘लोकतन्त्र की प्रयोगशाला’ मे भारत के इतिहास के उस अध्याय को जी रही है, जो ‘ग़ुलामो का ग़ुलाम’ कहलाता है। यह गुलामो की ग़ुलाम सरकार अँगरेज़ों से अधिक भयावह दिख रही है; क्योंकि हमारी जिस स्वाभिमानिनी ‘हिन्दी-भाषा’ को आक्रान्ताओं ने रौंदा था, उसी पथ पर देश की वर्तमान सरकार गर्व के साथ छद्म ‘वीरांगना’ की भूमिका मे ‘छप्पन इंच’ का सीना ताने ‘मत्त-उन्मत्त गयन्द’ की भाँति चलती आ रही है, जिसके पद-प्रहार से हमारी हिन्दी की समृद्ध-सम्पन्न यशस्विनी वाटिका रौंदी जा रही है और उसके पीछे चली आ रही बहुसंख्यक जनता आगे बढ़-बढ़ उसकी आरती उतारने के लिए होड़ मे लग चुकी है। ऐसा इसलिए कि कथित बहुसंख्यक जनता भी ‘हिन्दी’ से अपना पिण्ड छुड़ाना चाहती है; क्योंकि वह ‘नागिन-सी धूलि मे लोटती’ अपने केश का विन्यास करते हुए ‘बट आई थिंक, तुम कितने स्वीट हो यार! सोचती हूँ। ओके बेबी; बाय फिर मिलेंगे।’ वाली सभ्यता को अपने ‘पर्स’ मे डाले ‘डेटिंग’ के लिए जा रही होती है। वहीं एक नमूना ऐसा भी है, जो कल तक हिन्दी-भाषा मे किसी के भी साथ संवाद कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता था, ‘आज’ सार्वजनिक जीवन मे भी ‘ओ यस डार्लिंग! टुमारो हम इसी प्लेस पर मीट करेंगे’, कहकर अपनी अतृप्त कामनालोक मे विचरण करने लगता है। ऐसा इसलिए कि उसे उसकी शब्दावली में– हमें तो अपनी सोसाइटी मेण्टेन करनी होती है। ठीक उसी प्रकार से देश के ‘सरकार बहादुर’ हमारी उस नागरी लिपि और हिन्दी-भाषा का अपहरण कर ‘सोमरस’ पीकर बेसुध पड़े लोग को अपनी कलात्मक हिन्दी-भाषा के प्रयोग से ‘सम्मोहित’ करते दिखते हैं; जबकि नेपथ्य मे कुछ और ही घट रहा होता है, जहाँ ‘फेम इण्डिया स्कीम’, ‘स्किल इण्डिया’, ‘स्टार्टअप इण्डिया’, ‘नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम’, ‘सोशल सेक्योरिटी स्कीम’, ‘स्कीम फार एडोलसेंट गर्ल्स’, ‘डिजिटल स्कीम’, ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’, ‘राइज स्कीम’, ‘क्लीन-अप कोच’, ‘परम मिनिस्टर जेनेरेशन प्रोग्राम’, ‘गुड गवर्नेंस’, ‘स्मार्ट सिटी’, ‘स्मार्ट सिटी मिशन’, ‘मेक-इन-इण्डिया’ आदिक बड़ी संख्या मे षड्यन्त्र को अभिनय मे ढालकर हमारी गौरवशालिनी हिन्दी के साथ विश्वासघात करने की तैयारी की जा रही है। उल्लेखनीय है कि इन सभी योजनाओं-परियोजनाओं के पीछे सरकार का अपना कोई ‘मौलिक’ चिन्तन नहीं है; वे सभी शब्द ‘आयातित’ हैं। यह भी ध्यातव्य तथ्य है कि देश-स्वातन्त्र्य के पश्चात् से ‘नरेन्द्र मोदी’ नामक प्रधानमन्त्री ने जितने देशों की यात्राएँ की हैं, उतनी किसी भी प्रधानमन्त्री ने नहीं की थी। यही कारण है कि भारतीय परिवेश में पाश्चात्य परियोजनाओं को ‘ज्यों-का-त्यों’ लेकर उस पर ‘न्यू इण्डिया’ की ‘छाप’ लगाकर ‘ब्राण्डेड’ माल की तरह से देश के नब्वे प्रतिशत लोग को खुली आँखों से मूर्ख बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं, जो दस प्रतिशत अँगरेज़ी-भाषा को पढ़ना-लिखना-समझना जानते हैं, उनमे से कितने प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो ‘हिन्दीघातिनी’ वतर्मान सरकार की अँगरेज़ी नामोवाली योजनाओं-परियोजनाओं को समझते हैं।

मेरा दो टूक कहना है– देश की सरकार को ‘मोदी-सरकार’ कहनेवाले एक-सिरे से धूर्त्त हैं, जो देश/केन्द्र की सरकार को ‘व्यक्ति-विशेष’ की सरकार कहकर उस कथित व्यक्ति को ‘मनबढ़’ तो बना ही रहे हैं, ‘भारतीय संविधान’ के साथ भी ‘बल-प्रयोग’ करते आ रहे हैं।

यह विषय यही समाप्त नहीं हो जाता है। इन दिनो ‘कोरोना’ नामक विपदा (‘आपदा; का प्रयोग अशुद्ध और अनुपयुक्त है।) से देश ग्रस्त है और यहाँ भी पढ़े-लिखे ग़ुलामो के ग़ुलाम ‘लॉक-डाउन’, ‘क्वारंटाइन’, ‘क्वारंटीन’, ‘हॉट-स्पॉट’, ‘रैपिड एंटी बॉडी टेस्ट’ आदिक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, जिन्हें इन सभी शब्दों के अर्थ और अवधारणा की समझ ‘एक प्रतिशत’ भी नहीं हैं। ऐसे लोग की बड़ी संख्या है (हमारे राजनेता तो ‘निल बटे सन्नाटे हैं’।), जो ‘क्वारंटाइन’ और ‘क्वारंटीन’ की वर्तनी/अक्षरी’ आंग्ल लिपि मे नहीं लिख सकते और यह भी नहीं बता सकते– इन दोनो शब्दों में कैसा अन्तर है ?

अब ऐसा लगने लगा है कि वर्तमान दम्भी सरकार, हमारी हिन्दी को जिस सीमा तक व्यावहारिक ‘राजभाषा’ का स्थान मिला है, उसे भी छीन लेना चाहती है; लेकिन हम हिन्दीसेवी ऐसा किसी भी क़ीमत पर नहीं होने देंगे। ऐसे कृतघ्न लोग का ‘प्रचण्डरूपा’ हमारी हिन्दी वहाँ संहार करेगी, जहाँ उन्हें ‘शव-वस्त्र’ भी नहीं मिल पायेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ अप्रैल, २०२० ईसवी)