◆ निम्नलिखित वाक्यों को सकारण शुद्ध करें :–
१- वह ब्याख्यान दी थी।
२- रेलगाड़ी देर से रेलवेस्टेशन में आयेगा।
ध्यानपूर्वक शुद्ध और उपयुक्त उत्तर टिप्पणी-सहित ग्रहण करें। (इस आशय का उत्तर किसी भी पुस्तक मे उपलब्ध नहीं है और न ही अन्य कोई बता सकेगा।)
शुद्ध वाक्य–
१- ‘उसने व्याख्यान किया था’।
★ सकारण उत्तर–
मूल धातु-शब्द ‘ख्या’ है, जिसका अर्थ ‘कहना’ है। इसके पूर्व मे (‘में’ अशुद्ध है, क्योंकि पंचमाक्षर अनुस्वार-युक्त है, जो कि ‘नासिका’ से उच्चरित होता है; ‘म’ पर अथवा उसकी मात्रा मे बिन्दी-प्रयोग ‘अनर्थ’ का सूचक है।) ‘आ’ उपसर्ग प्रयुक्त है। इस धातु मे ‘अङ्’ और ‘टाप्’ प्रत्ययों के योग से ‘आख्या’ शब्दसर्जन/शब्द-सर्जन/शब्द का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध शब्द है।) होता है।
किसी को सूचना देना, किसी कार्य अथवा घटना का विवरण लिखना अथवा लिखाना ‘आख्या’ है। अब इसी ‘आख्या’ से पूर्व ‘वि’ और ‘आ’ (वि+आ= व्या) उपसर्ग हैं; शेष की ‘ख्यात’ की तरह रचना है। शुद्ध शब्द ‘व्याख्या’ होता है, न कि ‘ब्याख्या’। व्याख्या मे ‘ल्युट्’ प्रत्यय लगते ही ‘व्याख्यान’ का अस्तित्व उभरता है। यहाँ क्रिया ‘की’ जा रही है, न कि ‘दी’ जा रही है। कोई भी क्रिया सदैव की जाती है; जैसे– परिभाषा की जाती है; विचार किया जाता है; चिन्तन-मनन-ध्यान किये जाते हैं; संकल्प किया जाता है; आश्वासन किया जाता है इत्यादिक [इसी प्रकार (के शब्द) से सम्बन्धित।]। इस दृष्टि से हम ‘आख्या’ (आख्यान) करते हैं; ‘व्याख्या’ (व्याख्यान) ‘करते’ हैं, न कि ‘देते’ हैं। लिंगानुशासन के अन्तर्गत व्याख्यान पुंल्लिंग-शब्द है, इसलिए क्रिया भी पुंल्लिंग की ही होगी। इस प्रकार क्रिया-प्रयोग ‘किया था’ हो जायेगा।
‘वह व्याख्यान किया था।’ मे वाक्य-विन्यास असंतुलित है; क्योंकि ‘वह’ के स्थान पर ‘उसने’ का व्यवहार होगा। एक उदाहरण देखें– ‘वह कहा था।’ यहाँ भी कर्त्ता-दोष’ है। इसके स्थान पर होगा– ‘उसने’ कहा था।
इस वाक्य में कर्त्ता शब्द ‘वह’ है। किसी भी वाक्य-परिवर्त्तन के आधार कर्त्ता और कर्म ही होते हैं। ‘वह’ एकवचन’ का शब्द है, इसलिए यहाँ भी एकवचन के रूप मे ‘उसने’ का ही प्रयोग होगा।
इस प्रकार शुद्ध वाक्य की रचना होती है :–
■ उसने व्याख्यान किया था।
शुद्ध वाक्य–
२- रेलगाड़ी देर ‘मे’ ‘प्लेटफ़ॉर्म पर’ ‘पहुँचेगी’।
★ सकारण उत्तर– रेलगाड़ी ‘स्टेशन’ पर इसलिए नहीं पहुँचेगी; क्योंकि रेलगाड़ी किस प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचेगी, पूर्व-निर्धारित रहता है और वह ‘प्लेटफ़ॉर्म’ पर ‘ही’ पहुँचती है। आपको भूलना नहीं चाहिए कि स्टेशन के ‘पूछ-ताछकक्ष’ से जब भी उद्घोषणा की जाती है तब उससे यही ध्वनि निकलती है– ‘अमुक रेलगाड़ी अमुक प्लेफ़ॉर्म पर पहुँचेगी/पहुँचनेवाली है/पहुँच रही है’। यदि भूलवश/अज्ञानवश ‘आने’ की सूचना दी जा रही हो तो वह अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रयोग होता है। अँगरेज़ी मे ‘डिपार्चर’ और ‘एराइह्वल’ प्रयोग किये जाते हैं, न कि ‘गोईंग-कमींग’ के प्रयोग। रेलगाड़ी किसी स्टेशन से चलकर दूसरे स्टेशन के निर्धारित प्लेफ़ॉर्म पर ही पहुँचती है। सभी प्लेफ़ॉर्म स्टेशन के अन्तर्गत आते हैं। शुद्ध और उपयुक्त शब्द रेलस्टेशन/रेल-स्टेशन है, न कि रेलवे/रेल-वे स्टेशन; क्योंकि ‘रेलवे’ का अर्थ है, ‘रेलगाड़ी का मार्ग’, फिर किसी भी ‘मार्ग का स्टेशन’ नहीं होता; मार्ग पर व्यक्ति चलता है; वाहन चलाये जाते हैं और ‘स्टेशन’ (पड़ाव/ठहराव) उन्हीं का होता है।
यहाँ महत्त्वपूर्ण यह है कि ‘रेल-स्टेशन’ व्यापक शब्द है, जिसके अन्तर्गत यात्रियों से सम्बन्धित रेलविभाग की सारी गतिविधियाँ सम्मिलित रहती हैं। ‘देर से’ का प्रयोग अशुद्ध है। ‘अधिकरण कारक’ के अन्तर्गत ‘देर मे’ होता है।
इस प्रकार शुद्ध वाक्य है :– ■ रेलगाड़ी देर मे प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचेगी।
‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन कृति से सकृतज्ञता गृहीत।
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(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)