मन का अन्धा सुन!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ऐ कलियुगी धृतराष्ट्र!
तुमने अपनी प्रजा को छला;
मात्र सत्तासुख की ख़ातिर
तुमने लक्ष्मणरेखा पार की।
तुझे अपनो से मोह ने,
‘अपनो’ से दूर कर दिया।
जिन पर तुझे गुमान है,
वे भी एक-एक कर
चीलर लगी बण्डी की तरह
तुझे उतार फेंकेंगे
और तू देखता रह जायेगा।
धृतराष्ट्र!
कुरुक्षेत्र का मैदान तत्पर है,
तेरे दुर्योधनऔर दुश्शासन को ललकारने के लिए;
अर्जुन के गाण्डीव का टंकार तो–
सुन सकता है न?
पांचजन्य का निनाद
किसी भी समय हो सकता है।
अब तू अपने ‘संजय’ को
अपने पास बैठा ले;
क्योंकि तू मानस-चक्षुविहीन है;
क्या देखेगा; कैसे देखेगा;
एक-एक कर गिरते हुए, नरमुण्ड को?
तू विलाप ही कर सकेगा;
विधवा-विलाप!

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ अगस्त, २०२३ ईसवी।)