ग़ज़ल : खुद का जो हो न सका कैसे हमारा होगा

अनीता सिंह-


जब भी शीशे में उसने ख़ुद को निहारा होगा
मेरी आँखों के बिना कैसे संवारा होगा।

आज लगता है ये पानी क्यों चाँदी चाँदी
रात ने चाँद को दरिया में उतारा होगा।

किसकी सिसकी पे थम गई है हवा चलती सी
किसी विरहन को फिर साजन ने बिसारा होगा।

जुगनुएँ ढूंढती किसको है रोशनी लेकर
किसी भटके ने जंगल से पुकारा होगा।

एक हलचल सी हो रही है घोसलों में अभी
फिर परिंदों ने बच्चों को दुलारा होगा।

कैसे इल्ज़ाम जफ़ाओं का लगाऊँ उसपर
दूर है तो किसी बेबस का सहारा होगा।

वो परिंदा जो मस्तूल पे जा बैठा है
नाव दुश्मन की है पर दूर किनारा होगा।

चोट खाई है तो इश्क़ से तौबा कर ली
कैसे कह दोगे कि फिर न दोबारा होगा।

जिसने मयखाने में ही घर बना के रखा है
खुद का जो हो न सका कैसे हमारा होगा।