जगन्नाथ शुक्ल…✍
(प्रयागराज) ०९६७००१००१७
ईश्वर आपस में नहीं झगड़ते इंसानों को मत लड़वाओ तुम।
मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब बनवाओ रुग्णालय तुम।।
असमय कलियाँ मुरझा जातीं,
बिखरे शूलों के भय से।
विदुर-नीति भी शरमा जातीं,
कपटी दुर्योधन की जय से।
चाँद मलिन हो जाता है,
पड़ जाती छाया जब राहु की।
विचलन होता जब कर्म-धर्म में,
कोई बच न पाया है क्षय से।
नित काल -गाल में समा रहे,
शिशुओं की तुम सुध कर लो।
उत्तम पोषण न हो शोषण, अब बनवाओ तरुणालय तुम।
मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब बनवाओ रुग्णालय तुम।।
रोपे थे पौधे कुछ हाथों ने,
तब जा कर कोंपल फूटीं।
हरा-भरा उपवन करने वालों-
की हैं क्यों आशायें टूटीं?
क्या होगा इन वृक्षों का,
जब टूटेंगी इनकी शाखायें।
ग़र दीमक खा जायेंगे जड़ को;
तब समझो की जगती छूटी।
अलि बनकर कब तक गूँजोगे,
माली के ख़ातिर भी कुछ कर दो।
समय रेत-सा फिसला जाये,अब बनवाओ हृदयालय तुम।
मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब बनवाओ रुग्णालय तुम।।
सीमा पर अरि ललकारे,
आख़िर कब सिंहनाद होगा?
सत्ता के ख़ातिर भारत में,
क्या केवल जातिवाद होगा?
प्रश्न जटिल हैं बिखरे-बिखरे,
मर्यादित जीवन के पथ में।
महनीयों कुछ तो सुधरो,
आख़िर कब राष्ट्रवाद होगा?
कहीं सिसकती और सुबकती,
न मिल जायें भारत माता।
उससे पहले जाग उठो, अब बनवाओ सौहार्द-आलय तुम।
मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब बनवाओ रुग्णालय तुम।।