हमे लिपि और भाषा का समादर करना सीखना होगा

‘सर्जनपीठ’ और ‘भारती भवन पुस्तकालय का संयुक्त बौद्धिक परिसंवाद

हिन्दीभाषा, साहित्य एवं पत्रकारिता के उन्नायक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि की पूर्व-संध्या मे नगर के गण्यमान्य बुद्धिजीवी-वर्ग ने आचार्य द्विवेदी का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए, अपने विचार प्रकट किये थे। 

आयोजन 'सर्जनपीठ' एवं 'भारती भवन पुस्तकालय' के संयुक्त तत्त्वावधान मे १४ मई को भारती भवन पुस्तकालय, लोकनाथ, चौक, प्रयागराज के सभागार मे किया गया था।

आरम्भ मे, समारोह-अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने दीप-प्रज्वलन और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के चित्र पर माल्यार्पण करके बौद्धिक परिसंवाद-कार्यक्रम का उद्घाटन किया था, तत्पश्चात् कवि पं० राकेश मालवीय ‘मुसकान’ ने माँ शारदा का वन्दन किया। संयोजक एवं भारती भवन पुस्तकालयाध्यक्ष स्वतन्त्रकुमार पाण्डेय ने अतिथिवृन्द का स्वागत किया।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ने कहा, “मीडिया मे लिपि की दयनीय स्थिति है। वहाँ भाषाबोध कराने की आवश्यकता है। भाषा के प्रति संवेदना की आवश्यकता है।”

वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक सतीशचन्द्र तिवारी ने कहा, “देवनागरी लिपि विश्व की एकमात्र ऐसी वैज्ञानिक लिपि है, जो जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी भी जाती है।”

अध्यक्ष के रूप मे हिन्दी-प्रवक्ता डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया, ”अपनी लिपि और भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक की कर्मशालाओँ का आयोजन कराना होगा। इसके साथ ही शैक्षणिक गतिविधियोँ का हिन्दीभाषा मे अधिकतम प्रयोग तथा समाचारपत्र, संवाददाता, रेडियो-टी० ह्वी०-प्रस्तोता को शुद्ध उच्चारण और लेखन के प्रति सदैव जागरूक रहने की आवश्यकता है।”

आयोजक एवं संचालक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया, ”देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा का वैश्विक विस्तार सराहनीय है; परन्तु शुद्धता की दृष्टि से अभी बहुत पिछड़ी है। इसके लिए प्राथमिक स्तर से उच्चशिक्षा के स्तर तक की एक नियमित अन्तराल पर विषय-विशेषज्ञोँ के मार्गदर्शन कर्मशाला का आयोजन होते रहना चाहिए।”

एम० एन० एन० आइ० टी० के सहायक निदेशक (राजभाषा) प्रमोद द्विवेदी ने कहा, “देवनागरी लिपि सर्वधिक समृद्ध लिपि है लगभग प्रत्येक ध्वनि के लिए इसमे अलग-अलग चिह्न हैं और इसको सीखने पर वर्तनी संबंधी समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं।”

विचारक हरिशंकर तिवारी ने कहा, “सभी भारतीय भाषाओँ की लिपियोँ मे एकरूपता होनी चाहिए।”

वरिष्ठ छायाकार अरविन्द मालवीय ने कहा, “लिपि और भाषा मे शुद्धता तभी आ सकती है जब उसकी घर से शुरुआत हो।”

डॉ० कल्पना वर्मा ने कहा, “बच्चे जो मोबाइल पर रोमन मे बोलकर हिन्दी लिखते हैँ, उन्हेँ लिखने देना चाहिए।”

हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पुस्तकालय-सहायक दुर्गानन्द शर्मा ने कहा, “आज हमारी लिपि और भाषा की शुद्धतापूर्वक समृद्धि के लिए बहुत कुछ करना है। इसके लिए हमे शिक्षा-स्तर पर विचार करना होगा।”

प्राचार्य पूर्णिमा मालवीय ने कहा, “देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा को शिक्षा-स्तर पर शुद्धता की बात करना ‘बिल्ली के गले मे घण्टी बाँधना” जैसा है।”

वरिष्ठ पत्रकार अजामिल ने हिन्दी की दुर्दशा के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त की।

रेडियो-उद्घोषक तौक़ीर ख़ाँ ने कहा, “लिपि और भाषा हमे संस्कार देती है और जीवनशैली को परिमार्जित करती है।”

वरिष्ठ छायाकार शफ़ी अहमद ने कहा, ”शुद्ध उच्चारण पर बल देने की आवश्यकता है।”

वरिष्ठ पत्रकार ईश्वरशरण शुक्ल ने हिन्दी-पाठ्यक्रम मे शुद्ध भाषाप्रयोग करने पर बल दिया।

कवयित्री चेतना चितेरी ने कहा, “लिपि-स्तर पर रोमन का व्यवहार नहीँ होना चाहिए।”

वरिष्ठ पत्रकार उर्वशी उपाध्याय ने कहा, ”बच्चोँ को शुद्ध हिन्दी-लेखन के प्रति घर से ही वातावरण मिलना चाहिए।”

डॉ० अभिषेक केसरवानी ने ऐसे सारे विषयोँ को शासन-स्तर पर प्रस्तुत करने की सलाह दी है।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन संग्रहालय सहायक डी० एन० सारस्वत ने विकृत होती लिपि और भाषा के प्रति चिन्ता व्यक्त की।

कवि पं० राकेश मालवीय ‘मुसकान’ ने कहा, “हम जब देवनागरी लिपि और हिन्दीभाषा का शुद्धतापूर्वक व्यवहार की बात करते हैँ तब हमे आचार्य द्विवेदी की सजगता दिखती है, जिन्होँने खड़ी बोली हिन्दी को गद्य की भाषा के रूप मे मान्यता दिलायी थी।”

इस अवसर पर बंशीधर मिश्र, कंजिका पाण्डेय, शरद कुमार, दिनेश कुमार आदि की श्रोता के रूप मे उपस्थिति सराहनीय रही।

प्रमोद द्विवेदी ने आभार-ज्ञापन किया।