हम मलिन यों कर चुके हैं संस्कारों को तुम्हारे ;
औ’ धरे ही रह गये हैं शिष्टता के सूत्र सारे।
हो निरापद घूमते हम कृत्रिम यह ब्रह्माण्ड सारा
और बताते हैं स्वयं को भाग्य का मारा अभागा।
क्लिष्ट होती जा रही है नीति और नियति हमारी;
भाद्रपद की अमा को है चन्द्रदर्शन की पिपासा।।
भूलकर पथ पूर्वजों का चल रहे निज तूर्य लेकर
हम स्वयं में लीन हैं यों क्यों भला कोई पुकारे ।
हम मलिन यों कर……………………।।१।।
है नहीं कोई परीक्षा मानकर यह चल रहे हैं;
यों मनोगत ही समीक्षा समय की हम गढ़ रहे हैं।
चेतना को शून्य करके हो गए पूरे अचेतन;
और अवचेतन हुए से हम बहाना कर रहे हैं।।
मृदित कर निज शुद्धता को मुदित हो कर क्षुद्रता पर;
एक कीचक पल रहा है देह में प्रतिपल हमारे।
हम मलिन यों कर ……………………।।२।।
पूर्व की परिपाटियों को व्यर्थ कह उपहास करना;
और मन की घाटियों में नित नए इतिहास गढ़ना।
पीढ़ियों की छोड़िए , जो हैं उन्हें कर अनसुना;
हम नहीं, हम ही सही इस भाव का परिवेश मढ़ना।।
काँच – सा ये मन हमारा पत्थरों का रूप ले कर;
मौन है, पर कर रहा सब प्रश्न के उत्तर किनारे।
हम मलिन यों कर ……………………।।३।।
©जगन्नाथ शुक्ल….✍️
(प्रयागराज