लघुकथा : घुट्टी सब्र की

सोलह श्रृंगार से परिपूर्ण लाल जोड़े में सजी अक्षिता आज विवाह के उपरांत दूसरी बार इस चौखट के आगे थी। भीड़ आज भी कम नहीं थी,पर वातावरण की ये निस्तब्धता कोलाहल से भरे रहने वाले इस मोहल्ले के लिए अभूत पूर्व सी थी।इस नीरवता में गूंजा पहला स्वर उसके छोटे भाई का था – दीदी, दीदी क्या हुआ, उठो ना ???

पापा, प्लीज एक बार फिर वही सब्र वाली घुट्टी पिलाओ ना दीदी को, वो फिर ठीक हो जायेंगी, जैसे हर बार हो जाती थीं।आज सभी स्तब्ध थे कि आखिर ऐसा निषिद्ध कदम कैसे उठा लिया था अक्षिता ने, छोटे- छोटे अपने बच्चों और परिवार को बिलखता कैसे छोड़ दिया उसने। लेकिन कुछ जानकारों की मानें तो कुछ खास इस बार भी नहीं हुआ था, सिवाय इसके कि इस बार वो सब्र की घुट्टी वाली शीशी ही टूट गई थी।।

✍️अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा