‘सर्जनपीठ’ की ओर से प्रयागराज, वाराणसी एवं बलिया से एकसाथ आयोजित राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद

''आचार्य द्विवेदी के स्वप्न साकार करने के लिए हिन्दीभाषा का सर्वमान्य मानकीकरण अपरिहार्य''– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज। आज लेखन और पठन-स्तर पर हिन्दीभाषा की जिस स्तर पर दुर्गति की जा रही है, उसके प्रति देश के विद्वज्जन की न तो कोई चिन्तन है और न ही चिन्ता। इस कारण आज हिन्दी की जो स्थिति है, शोचनीय (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) आज ही की तारीख़ मे आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म हुआ था। उन्होँने जिस शब्दसाधना की प्रतिष्ठा की थी, वह अब प्रश्नो के घेरे मे आ चुकी है। हिन्दी का विस्तार तो हो रहा है; परन्तु जिस रूप मे हो रहा है, उससे उसके व्याकरणीय अस्तित्व के लिए एक गहरा संकट उत्पन्न हो चुका है। ऐसे मे, देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता को अक्षुण्ण रखते हुए, हिन्दीभाषा की शुचिता को बनाये रखने के लिए क्या करना होगा? इस प्रश्न पर विचार करने के लिए आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के जन्मदिनांक (१५ मई) की पूर्व-संध्या मे (‘संध्या पर’ अशुद्ध है।) ‘सर्जनपीठ’ की ओर से प्रयागराज, वाराणसी एवं बलिया से एकसाथ एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे इन ज़िलोँ के अलावा पुणे, कोल्हापुर, सीवान, हरदोई इत्यादिक ज़िलोँ के प्रबुद्धजन की सहभागिता थी।

पुणे से हिन्दी-अध्येत्री डॉ० नीलम जैन ने बताया– हिन्दीभाषा की शुद्धता बनाये रखने के लिए शुद्ध वर्तनी और व्याकरण का पालन अत्यन्त आवश्यक है। मात्राओँ, अनुस्वार, अनुनासिक एवं विसर्ग का सही प्रयोग भाषा की सुन्दरता को बढ़ाता है। हमे मोबाइल फ़ोन, कम्प्यूटर तथा डिज़िटल-माध्यम मे भी देवनागरी लिपि का प्रयोग करना चाहिए और अनावश्यक विदेशी शब्दोँ के प्रयोग से बचना चाहिए।

वारणा स्टेट पब्लिक युनिवर्सिटी वारणानगर, कोल्हापुर (महाराष्ट्र) से हिन्दी-विभागाध्यक्ष प्रो० प्रकाश चिकुर्डेकर ने कहा– आचार्य द्विवेदी की शब्द-साधना का अनुकरण करने से ही भाषा-व्यवहार मे शुचिता आ सकती है। हमे तद्भव के स्थान पर तत्सम शब्दोँ का ही व्यवहार करना चाहिए।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने सुस्पष्ट करते हुए बताया– जो लोग हिन्दीभाषा की शुद्धता को संस्कृतनिष्ठ मानते हैँ, वे अब भी अँधेरे मे हैँ। व्यक्ति जिस भी शब्द का वाचन और लेखन करे, वह व्याकरण-स्तर पर उपयुक्त रहे। मेरे को, तेरे को, करा, करी, स्वीकारा, दीख पड़ा, महसूसा-जैसी शब्दावली को हिन्दीभाषा मे स्वीकृति नहीँ मिलनी चाहिए। आचार्य द्विवेदी के स्वप्न को साकार करने के लिए शुद्धतापूर्वक सर्वमान्य मानकीकरण की आवश्यकता है, जिसे हर राज्य और संघ-शासित क्षेत्र मे शिक्षा, साहित्य, कार्यालयीय आदिक कार्योँ मे अपरिहार्य रूप से लागू करना होगा, तब जाकर भाषिक विसंगति दूर होती दिखेगी।

प्रयागराज से शिक्षाविद् डी० के० सिँह ने कहा– आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शब्द- साधना ने हिन्दी को अव्यवस्था से निकालकर एक सुव्यवस्थित, शक्त और मानक भाषा के रूप में स्थापित किया। उन्होँने हिन्दी को साहित्य ही नहीँ, बल्कि ‘ज्ञान की भाषा’ भी बनाया, जिसे प्रेमचंद ने ‘पथ-प्रदर्शक’ कहा। आज हमारे लिए उसी भाषा-व्यवहार की आवश्यकता है।

हरदोई (उत्तरप्रदेश) से महर्षि विवेकानन्द ज्ञानस्थली के संचालक, पत्रकार डॉ० राघवेन्द्रकुमार ‘राघव’ ने बताया– एक ही भाषा की अनेक बोलियोँ को देखते हुए, मानकीकरण अनिवार्य हो जाता है। इसका तात्पर्य भाषा को दुरूह बनाना नहीँ, अपितु उसे समयानुरूप, जीवन्त और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना भी है, जोकि वैश्विक परिदृश्य और आज के डिजिटल-युग मे हिन्दीभाषा-विकास के लिए अपरिहार्य है।

सीवान (बिहार) से डी० ए० ह्वी० पब्लिक स्कूल के अध्यापक प्रदीप तिवारी ने कहा– आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने जिस तरह से हिन्दी-भाषा को परिष्कृत कर, उसे एक व्यवस्थित और मानक रूप दिया था, आज उसी की आवश्यकता है। वैश्वीकरण और डिजिटल युग मे हिंग्लिश के बढ़ते प्रभाव , व्याकरणिक शुद्धता की उपेक्षा, अनुवाद की समस्या आदिक पर सकारात्मक विचार करना होगा।

बलिया (उत्तरप्रदेश) से सुशिक्षिता एवं गृहिणी रश्मि यादव ने कहा– हिन्दी की शुद्धता से मुख मोड़ने पर समाज मे भाषाई अराजकता व्याप्त हो जायेगी।

इनके अतिरिक्त वाराणसी से कवयित्री सुमन पटेल, ग़ाज़ीपुर से डॉ० रत्नेश मौर्य, रोहतक से डॉ० गार्गी शर्मा इत्यादिक की सक्रिय भागीदारी रही।