शिखा यादव–
पानी तो बिक रहा है, पवन बिक न जाए;
धरती भी बिक रही है, गगन बिक न जाए।
अन्तरिक्ष मे भी निगाहेँ हैँ सबकी लगीँ;
डर है, सूरज की तपन बिक न जाए।
स्वार्थनीति चलते, कोई जगह छूटी नहीँ;
डर है, कहीँ धर्म का चिन्तन बिक न जाए।
सिक्कोँ से तोलकर दुल्हे ख़रीदे जा रहे;
डर है, कहीँ नवेली दुल्हन बिक न जाए।
लुटेरे तो मनबढ़ दिखने लगे हैँ हर सू;
डर है, कहीँ अपना वतन बिक न जाए।
अब तो सरेआम सांसद भी हैँ बिकने लगे;
डर है, कहीँ संविधान-भवन बिक न जाए।
इंसाँ तो मरा हुआ, आँखेँ खुली हुई हैँ;
डर है, मुरदे का कफ़न बिक न जाए॥