सोनू गुप्ता (लेखक एक दृष्टिबाधित युवक हैं)–
(यह लेख एक दृष्टिबाधित युवा के उन निजी अनुभवों और खामोश जद्दोजहद पर आधारित है, जिसे अक्सर उत्सव की चमक-धमक में भुला दिया जाता है ।शादी का घर खुशियों का समंदर होता है, जहाँ हर कोई अपनी धुन में मग्न होता है। लेकिन इसी शोर-शराबे और उल्लास के बीच एक दृष्टिबाधित युवा के लिए दुनिया अक्सर एक कुर्सी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती है। यह लेख किसी की शिकायत नहीं, बल्कि उन भावनाओं का आईना है जो प्यार, चिंता और आत्मसम्मान के बीच हर पल संघर्ष करती हैं।)
ममता का सुरक्षा चक्र और ‘पिता’ का निस्वार्थ स्नेह–
एक दृष्टिबाधित बेटे के लिए उसके माता-पिता की चिंता सबसे गहरी और पवित्र होती है। उनके लिए वह आज भी वही मासूम बच्चा है जिसे दुनिया की हर ठोकर से बचाना उनकी पहली जिम्मेदारी है। यद्यपि उसकी आंखों में रोशनी नहीं है, लेकिन उसका दिमाग और महसूस करने की शक्ति इतनी तेज है कि वह आवाजों और आहटों से ही पूरे माहौल का नक्शा खींच लेता है।
मगर, जब 19-20 साल का वह युवा शादी में जाता है, तो पिता की ममता उसे अकेला नहीं छोड़ती। पिता खुद जाकर पानी का गिलास लाते हैं, खाने की प्लेट सजाते हैं और उसे थमाते हैं। यह दृश्य प्रेम से भरा तो लगता है, पर उस युवा के मन में एक अजीब सी टीस पैदा कर देता है। उसे लगता है कि क्या उसकी पहचान हमेशा एक ‘जरूरतमंद’ की ही रहेगी? पिता की आँखों में फिक्र है, तो बेटे के मन में अपनी मानसिक शक्ति के बल पर आत्मनिर्भर दिखने की एक दबी हुई हसरत।
“बेटा, बैठ जाओ…” बढ़ते कदमों पर अपनों की रोक–
शादी में घंटों एक जगह बैठे रहना किसी सजा से कम नहीं होता। जब वह युवा बोरियत मिटाने के लिए या सिर्फ अपनी इंद्रियों के जरिए माहौल को महसूस करने के लिए अपनी कुर्सी छोड़ता है, तो अचानक चारों तरफ से शुभचिंतकों की आवाजें गूँजने लगती हैं— “अरे बेटा, कहाँ जा रहे हो? कहीं जाना है क्या? बैठ जाओ, हम लाकर दे देते हैं।” इन आवाजों में नफरत नहीं, बल्कि बहुत गहरा लगाव होता है। वे रिश्तेदार, जो उसे बचपन से बढ़ते देख रहे हैं, उसे चोट लगने से बचाना चाहते हैं। पर वे यह नहीं समझ पाते कि बार-बार की यह टोक उसे उसकी सीमाओं की याद दिलाती रहती है। उसे महसूस होने लगता है कि वह अपनी मर्जी से दो कदम भी चलने के लिए स्वतंत्र नहीं है।
गांव की वो बेबाक बातें: “सब कुछ तो नीक है, पर बेचारे को…”
शादी में कुछ दूर-दराज के रिश्तेदार ऐसे भी आते हैं जो बहुत सालों बाद मिलते हैं। गांव-देहात की सादगी में वे कभी-कभी ऐसी बातें कह जाते हैं जो सीधा दिल पर लगती हैं। वे सामने खड़े होकर आपस में ही चर्चा करने लगते हैं—
“देखो भैया, भगवान की माया… शक्ल-सूरत इतनी बढ़िया है, विचार और बुद्धि भी एकदम नीक (अच्छी) है, पर बेचारे को दिखाई नहीं देता। सब कुछ ठीक रहा, बस यही एक कमी रह गई।”
जब वे चेहरे की बनावट और सुंदर व्यक्तित्व को देखकर “बेचारा” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उस युवा को समझ नहीं आता कि वह क्या कहे। उसे अपनी काबिलियत या अच्छे विचारों पर गर्व करने के बजाय अपनी उस ‘कमी’ पर लोगों की सहानुभूति झेलनी पड़ती है, जो उसने खुद नहीं चुनी। वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भीड़ के लिए कौतूहल और दया का पात्र बनकर रह जाता है।
आत्मसम्मान और उम्र का वो ‘अजीब’ पड़ाव
19-20 साल की उम्र वह दहलीज है जहाँ हर इंसान अपनी पहचान बनाना चाहता है। इस उम्र में जब उसे किसी छोटे बच्चे की तरह बार-बार टोका जाता है, तो उसे खुद भी संकोच होता है और सेवा करने वाले रिश्तेदारों के मन में भी एक अजीब सी हिचक होती है। उत्सव के बीच में वह एक जगह बैठा-बैठा मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करने लगता है, क्योंकि उसका शरीर तो स्थिर है पर उसका मन पूरे समारोह का हिस्सा बनना चाहता है।
निष्कर्ष: प्रेम को ‘भरोसे’ की जरूरत है
परिवार और रिश्तेदारों की यह चिंता पूरी तरह जायज है और उनके दिल के जुड़ाव का प्रमाण है। उनकी ममता वंदनीय है। लेकिन अब समय है कि इस प्रेम में ‘सुरक्षा’ के साथ-साथ ‘विश्वास’ को भी जगह दी जाए।
सच्चा सम्मान उसे कुर्सी पर बिठा देने में नहीं, बल्कि उसकी मानसिक शक्ति और क्षमता पर भरोसा करके उसे भीड़ के बीच आत्मनिर्भर होकर चलने देने में है। उसे सहारा दीजिए, पर उसे सीमित मत कीजिए।
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