चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के जन्मदिनांक ७ जुलाई के अवसर पर विशेष
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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हिन्दी-साहित्य की बहुसंख्य छात्र-छात्राएँ और अध्यापक-अध्यापिकाओँ को चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के विषय मे इतना ही बोध है कि उन्होँने ‘उसने कहा था’ और बहुत हुआ तो ‘सुखमय जीवन’ और ‘बुद्धू का काँटा’ का लेखन किया था और उससे भी अधिक हुआ तो उनके दो निबन्ध ‘मारेसि मोहिँ कुठाँव’ और ‘कछुआ-धरम’ ज़बान पर आ जाती है; जबकि सत्य और तथ्य इससे नितान्त परे है। गुलेरी ने अध्यवसाय और स्वाध्याय के बल पर हिन्दी के अतिरिक्त पालि (‘पाली’ अशुद्ध है।), प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, गुजराती, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अँगरेज़ी, जर्मन, लैटिन तथा फ्रेंच-भाषाओँ का ज्ञान अर्जित किया था। भाषिक विद्वत्ता (‘विद्वता’ अशुद्ध है।) के अतिरिक्त विषय-अभिरुचि का विस्तार अत्यधिक था। वे अल्पावस्था मे ही अध्यात्म, ज्योतिष, दर्शन, कला-संस्कृति, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, भाषाविज्ञान, इतिहास-पुरातत्त्व, राजनीति इत्यादिक विषयोँ को ग्रहण करने मे निष्णात थे। इसका दृष्टान्त समक्ष तब उभरता है जब कोई अध्येता उनके समग्र साहित्य का परिशीलन करता है। उनकी जीवनावधि मात्र ३९ वर्ष की थी; किन्तु जब उनकी सर्जनगति, संख्या और वैविध्य पर दृष्टिनिक्षेपण होता है तब ज्ञात होता है कि उपर्युक्त समस्त विषयोँ का प्रतिपादन उनके लिए हस्तामलक बन जाता था।
उनकी सम्बद्ध विषयोँ की कृतियोँ मे व्यवस्था के अत्याचार के विरुद्ध उगलती आग देखी जा सकती है। प्रायः देखा गया है कि बहुसंख्य साहित्यकार अनुचित रीति-नीति के विरुद्ध केवल आँखेँ मूँदकर तलवार भाँजने का कृत्य करते हैँ; जबकि गुलेरी खण्डन तो करते ही हैँ; उचित और उपयुक्त मण्डन भी करते दिखते हैँ। उनकी लेखनी धर्म, समाज, राजनीति इत्यादिक विषयोँ पर कबीरवाद के सिद्धान्त और व्यवहार की तरह से आग उगलना जानती जानती है। वे पाखण्ड और बाह्याडम्बर पर कठोर प्रहार करते हैँ। यही कारण है कि उनके आलोचनात्मक विचार आज भी प्रासंगिक दिखते हैँ। वे धर्म को कर्मवाद से दूर करते हुए, आचार-विचार, लोककल्याण तथा जनसेवा से जोड़कर देखते हैँ। उन्होँने वर्ष १९०६ मे ‘श्री भारतवर्ष महामण्डल रहस्य’ विषय पर विचार व्यक्त किया था, “उदारता, सौहार्द और मानवतावाद ही धर्म के प्राणतत्त्व होते हैँ और इस तथ्य की पहचान बेहद ज़रूरी है।” उन्होँने यह भी प्रासंगिक विचार प्रकट किया था, “आजकल वह उदार धर्म चाहिए, जो हिन्दू, सिक्ख, जैन, पारसी, मुसलमान, कृस्तान सबको एक भाव से चलावे और इनमे बिरादरी का भाव पैदा करे; किन्तु संकीर्ण धर्मशिक्षा… (आदि) हमारे बीच की खाई को और भी चौड़ी बनायेँगी।”
चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानियोँ की अधिकतम संख्या तीन बतायी जाती है; जबकि शोध के आधार पर उनकी संख्या सात है :– (१) उसने कहा था (२) घण्टाघर (३) धर्मपरायण रीछ (४) सुकन्या (५) सुखमय जीवन (६) बुद्धू का काँटा (७) हीरे का हार।
उनकी कहानियोँ का सर्वाधिक विशिष्ट पक्ष यह है कि उनमे उत्तम कोटि की मौलिकता, मनोविश्लेषण, जीवन की गहन संवेदना, यथार्थ और सत्य का सम्मिश्रण, मानवता का संदेश, श्रेष्ठ कोटि की वैज्ञानिक भाषा, कथावस्तु-सौष्ठव, समृद्ध कलापक्ष, चरित्रचित्रण मे जीवन्तता आदिक का अनुभव किया जा सकता है।
बहुत कम साहित्यकार और विद्यार्थी-अध्यापक जानते होँगे कि उन्होँने कविता-रचना भी की थी। ‘एशिया की विजयादशमी’, ‘अहिताग्निका’, ‘झुकी कमान’, ‘स्वागत’, ‘कुसुमांजलि’, ‘रवि’ उनकी कविताएँ हैँ। उन्होँने पन्द्रह से अधिक लघुकथाओँ का भी लेखन किया था, जिनमे ‘महर्षि’, ‘बकरे का स्वर्ग’, ‘पाठशाला’, ‘स्त्री का विश्वास’, ‘राजा की नीयत’, ‘साँप का वरदान’, ‘पाठशाला’, ‘कुमारी प्रियंकरी’, ‘न्याय रथ’, ‘न्याय घण्टा’, ‘बरक़्क़त’, ‘कर्ण का क्रोध’, ‘शक्कर का चूर्ण’, ‘बन्दर’, ‘जन्मान्तर’, ‘विद्या से दुख’ इत्यादिक सम्मिलित हैँ। ‘देवकुल’, ‘पुरानी पगड़ी’, ‘पृथ्वीराज विजय महाकाव्य’, ‘जय सिंह प्रकाश (इतिहास-पुरातत्त्व) इनके अतिरिक्त उनके कई निबन्ध भी हैँ :– ‘मारेसि मोहिँ कुठाँव’, ‘कछुआ धरम’ तथा ‘होली की ठिठोली का एप्रिल फूल’। उनकी एक पुस्तक भाषाविज्ञान पर भी है, जिसका नाम ‘पुरानी हिन्दी’ है। उनकी शोधात्मक कृति ‘महर्षि च्यवन का रामायण’ भी एक उल्लेखनीय पुस्तक है।
मौलिक लेखन के साथ-साथ उनकी सम्पादनकला भी चलती रही, जिससे उनके सम्पादकत्व-कौशल का भी सुपरिचय प्राप्त होता है। इसके लिए हमे वर्ष १९०० से १९०२ की अवधि को समझना होगा, जब उन्होँने वर्ष १९०० मे जयपुर मे एक साहित्यिक संस्था ‘नागरी मंच’ के गठन मे अपना अवदान किया था। वहीँ के ‘नागरी भवन’ से प्रकाशित होनेवाली चर्चित मासिकी ‘समालोचक’ का उन्हेँ सम्पादक बनाया गया था। इसके लिए जासूसी-कथाकार गोपालराम गहमरी ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हेँ १९०२ मे ‘समालोचक’ नामक हिन्दी-मासिकी का सम्पादन करने के लिए आमन्त्रित किया था। उनसे पहले लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार-समीक्षक किशोरीलाल गोस्वामी उसके सम्पादक थे। गुलेरी कुछ वर्ष तक ‘काशी नागरी प्रचारिणी-सभा’ के सम्पादक-मण्डल के सदस्य भी रहे। उन्हेँ ‘नागरी प्रचारिणी-सभा’ के सभापति का भी दायित्व सौँपा गया था। उन्होँने ‘देवी प्रसाद ऐतिहासिक पुस्तक-माला’ और ‘सूर्य कुमारी पुस्तक-माला’ के सम्पादनकार्य के दायित्व का समुचित ढंग से निर्वहण (‘निर्वाहण’ और ‘निर्वाहन’ अशुद्ध हैँ।) किये थे।
गुलेरी के विषय मे इतना ही सत्य नहीँ है कि उन्होँने स्वाध्याय के द्वारा भाषिक विशेषज्ञता अर्जित की थी; प्रत्युत उन्होँने देश के तत्कालीन उत्तम कोटि के शिक्षालयोँ मे भी विद्यार्जन किया था। उसके मूल
मे उनका पारिवारिक संस्कार था। उनके पिता पण्डित शिवराम शास्त्री ज्योतिर्विद् थे और पण्डित (ज्ञानी) भी। उन्हेँ ‘महामहोपाध्याय’ सम्मान से समलंकृत किया गया था। पण्डित शिवराम शास्त्री जयपुर के महाराजा सवाई राम सिँह के यहाँ ‘पण्डितराज’ (प्रधान पण्डित) थे। यही कारण था कि जब चन्द्रधर की अवस्था लगभग छ: वर्ष की थी तब उन्होँने ४०० श्लोक कठस्थ कर लिये थे। बताया जाता है कि जब कोई अतिथि उनके गृह मे प्रवेश करता था तब वे ‘अमरकोश’ का सस्वर पाठ करते थे।
७ जुलाई, १८८३ ई० को जयपुर (राजस्थान) के ‘राजपण्डित-परिवार’ मे जन्म लेनेवाले बालक चन्द्रधर शर्मा मे संस्कृत-भाषा के प्रति अभिरुचि पारिवारिक परिवेश की ही देन थी, जिसके कारण उनकी वेद-वेदान्त आदिक के अध्ययन, चिन्तन-मनन के प्रति क्रियाशीलता देखते ही बनती थी। चन्द्रधर शर्मा का परिवार हिमाचलप्रदेश के काँगड़ा जनपद के ‘गुलेर’ गाँव का था, इसलिए उन्होँने अपने मूल नाम के आगे ‘गुलेरी’ उपनाम का प्रयोग किया था। उन्होँने वर्ष १८९३ मे महाराजा कॉलेज, जयपुर मे प्रवेश किया, जहाँ से उनके मन-मानस मे अँगरेज़ी-शिक्षा का बीजारोपण हुआ। उन्होँने वर्ष १८९७ मे द्वितीय श्रेणी मे मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय से एफ० ए० (मैट्रिक) प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण किया था। उन्होँने इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे प्रवेश पाने के लिए प्रवेश-परीक्षा दी थी, जिसमे उन्होँने तत्कालीन समस्त कीर्तिमान भंग करते हुए, सर्वाधिक अंक अर्जित किया था। वे स्नातक से स्नातकोत्तर की ओर बढ़ना चाहते थे, जिसके लिए उन्होँने संस्कृत, तर्कशास्त्र, इतिहास, ग्रीक, रोमन, गणित, भौतिकी और रसायनशास्त्र का अध्ययन किया था; परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण वह इच्छा पूर्ण नहीँ हो पायी थी। जब वे २२ वर्ष के थे तब उनका परिणय पद्मावती के साथ हुआ था।
चूँकि उनकी ज्योतिष, इतिहास-पुरातत्त्व के अतिरिक्त संस्कृत और अँगरेज़ी-भाषाओँ मे दक्षता थी अत: वर्ष १९०२ मे जब जयपुर की वेधशाला (नक्षत्रशाला) का जीर्णोद्धार-कार्य प्रारम्भ हुआ था तब एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो उक्त भाषाओँ का पण्डित हो और गुलेरी उस कार्य-हेतु सर्वथा सुयोग्य थे। कर्नल सर सैमुअल स्विण्टन जैकब और कैप्टन ए० एफ० गैरेट को उक्त कार्य-निष्पादन के लिए नियुक्त किया गया था। उन्हेँ तत्सम्बन्धी अनुसंधानात्मक कार्य के लिए गठित मण्डल मे रख लिया गया था। उन्होँने उसी अवधि मे कैप्टन गैरेट के साथ मिलकर ‘द जयपुर ऑब्ज़रवेटरी ऐण्ड इट्स बिल्डर्स’ नामक एक अँगरेज़ी-कृति का प्रणयन किया था, जिसके लिए उन्हेँ स्वर्णपदक के साथ ३०० रुपयोँ की पुस्तकेँ भेँट की गयी थीँ।
उन्हेँ वर्ष १९०४ मे खेतड़ी के अवयस्क राजा जय सिँह का अभिभावक बनाया गया था, जिसके लिए उन्हेँ मेयो कॉलेज, अजमेर आना पड़ा था, जहाँ वे वर्ष १९०४ से १९२२ तक मेयो कॉलेज मे संस्कृत-विभाग के अध्यक्ष और वहाँ के छात्रावास के अधीक्षक के पदोँ पर नियुक्ति पाकर कार्य करते रहे। उनकी विद्वत्ता की चर्चा सर्वत्र फैल चुकी थी, जिससे प्रभावित होकर महामना पं० मदनमोहन मालवीय ने उनसे वर्ष १९२० मे आग्रह किया था कि वे वाराणसी पधारकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्यविद्या-विभाग के प्राचार्य का पदभार ग्रहण कर लेँ। उन्होँने पं० मालवीय के आग्रह को स्वीकार कर लिया था। उन्होँने वर्ष १९२२ मे उसी विश्वविद्यालय मे प्राचीन इतिहास और धर्म से सम्बन्धित मनीन्द्रचन्द्र नन्दीपीठ के प्राध्यापक का भी दायित्व ग्रहण किया था। यद्यपि वे वहाँ पूरी निष्ठा के साथ दायित्व-निर्वहण करना चाहते थे तथापि पीतरोग और तीव्र ज्वर से पीड़ित होने के कारण उनका ३९ वर्ष की अल्पायु मे १२ सितम्बर, १९२२ ईसवी को काशी मे ही निधन हो गया था।
एक बार की बात है; त्रिलोचन और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्यिक संवाद कर रहे थे। उसी बीच, त्रिलोचन ने आचार्य शुक्ल से प्रश्न किया था, ”आप अपने युग का सबसे बड़ा विद्वान् किसे मानते हैँ?” आचार्य शुक्ल का उत्तर था, “मैं आज तक जितने विद्वानों से मिला हूँ, उनमें स्वर्गीय चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ऐसे महापण्डित हैँ, जिनसे मै बहुत कुछ सीख सकता हूँ।”
महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज भी गुलेरी की प्रतिभा से प्रभावित थे। उनकी समकालीन शृंखला के सारस्वत हस्ताक्षरोँ पर दृष्टि पड़ते ही किशोरीलाल गोस्वामी, कामताप्रसाद गुरु, बालकृष्ण भट्ट, गौरीशंकर ओझा प्रभृति सुनाम उभरने लगते हैँ।
निश्चित रूप से चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ का समुचित रूप से मूल्यांकन करना शेष है, जिससे उनके कर्त्तृत्व के विविध आयाम संलक्षित होँ और शिक्षा-प्रचार-प्रसार के माध्यमो से उनका साहित्यिक और साहित्येतर योगदान को प्रकाशित किया जाये।
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