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आचार्य जी ने हिन्दी-भाषा का बहुविध परिष्कार किया था

आज भाषा-प्रबन्धन के निष्णात हस्ताक्षर आचार्य पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की जन्मतिथि (९ मई, १८६४ ई०) है।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी कवि, आलोचक, निबन्धकार, समर्थ सम्पादक तथा निजी सूझ-बूझ के मनुष्य थे। साहित्य में विविधता का पुट के लिए उन्होंने साहित्यिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, सामयिक आदिक विषयों पर अपनी लेखनी चलायी थी। उनमें विषय का विवेचन इतने आकर्षक ढंग से हुआ है कि पाठक-वर्ग के लिए विषय-वस्तु को हृदयंगम करना अत्यन्त सुगम हो जाता है। सूक्ष्म और गम्भीर बातों को सहज शब्दों में समझाने की उनमें अपूर्व क्षमता थी। बाल और किशोर-वर्गों के लिए उनके द्वारा लिखी गयीं पुस्तकें उनके बाल-मन को बहुविध स्थापित करती हैं।

प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का सम्पादन कर, उन्होंने सम्पादन-कला की एक अभिनव शैली विकसित की थी।

आचार्य जी के पास न तो शब्दों का अभाव था और न ही वे अनावश्यक शब्दों का प्रयोग करते थे। उन पर प्राय: कठोर तत्समवादी होने का आरोप लगाया जाता है, जो सर्वथा निर्मूल है। सच तो यह है कि वे न तो क्लिष्ट तत्समता के पक्षधर थे और न प्रतिदिन व्यवहार में आनेवाले विदेशी शब्दों के भण्डार के। भावों-विचारों की स्पष्टता और भाषा-शुचिता के प्रति वे सदैव आग्रहशील लक्षित होते हैं।

हम उनके आचार्यत्व के प्रति नमित हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ मई, २०२१ ईसवी।)

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