—- ० आत्ममन्थन ०—-
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आप हमारी जय-जयकार करें और हम आपकी। आप कूड़ा-कचरा से ‘मनदर्पण’ (फेसबुक) को भर दीजिए और हम कहेंगे— वाह! क्या स्वर्ण-रत्न है। हममें साहित्य और भाषा की कोई समझ नहीं है; परन्तु आप कहेंगे– वाह सर! आप तो क़लम-तोड़ लेखक हैं। दूसरी ओर, हमारे-आपके ‘अपलेखन’ से साहित्य और भाषा को कितनी क्षति पहुँचती है, उससे किसी का कोई प्रयोजन नहीं रहता। यही कारण है कि वर्तमान साहित्य रुग्णावस्था में है। उसके प्रति किसी में न कोई अनुकम्पाभाव है और न ही किसी की चिन्ता।
क्या बात है— ‘रहस्यवाद’, ‘छायावाद’, ‘हालावाद’ ‘प्रगतिवाद’ आदिक वाद जीवन्त हो चुके हैं! महादेवी का नव अवतार हो चुका है ; मीर तक़ी मीर और ग़ालिब भी क़ब्र से अंगड़ाई लेते दिखने लगे हैं। अज्ञेय, मुक्तिबोध, धूमिल आदिक खुरपी लेकर जाँघभर पानी में हेलकर कवितावादी खेत की निराई और गुड़ाई कर रहे हैं। जो लोग कभी अपने गाँव-मुहल्ले का इतिहास नहीं पढ़ सके, आज रामचन्द्र शुक्ल का अवतार लेकर ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिख रहे हैं। प्रगतिवादी-जनवादी फ़िल्मी अन्दाज़ में नागार्जुन को गाते हुए, हलों में जुते बैलों को खोदियाते हुए, किसानों के काव्यिक मसीहा बनने का अभ्यास कर रहे हैं, ” साथी हाथ बढ़ाना” और ख़ुद चिलम चढ़ाकर कोयलावाला इंजिन माफिक धुआँ फेंक रहे हैं। दक्षिणपन्थी अपनी कालिमा छुपाने के लिए श्वेतवस्त्रधारी और भगवाधारी बनकर दीनदयाल उपाध्याय की ‘एकात्म साधना’ पर चौंसठपेजिया लिखकर पुरस्कार हथिया रहे हैं; सरकार ‘सरकार’ का फ़र्क भी बहुत बड़ा फ़र्क दिखा देता है। तिरुवल्लुवर, विवेकानन्द, गोलवलकर आदिक पर लम्बा-चौड़ा हाँकेंगे; किन्तु उनके समग्र चिन्तन की निष्पत्ति का अंशत: भी अपने आचरण में धारण नहीं करेंगे। वामपन्थी मार्क्स, लेनिन, गोर्की, स्टालिन आदिक के सिद्धान्तों की चर्चा बड़े-बड़े मंचों पर इस तरह से करते हैं, मानो दोनों विचारकों का समन्वयवादी अवतारी पुरुष झकास बोल रहा हो। वे ज़मानेवालों को दिखाने के लिए चीन-रूस के दार्शनिकों और समाजचिन्तकों की बात अपने भाषणों और अपनी कविताओं में ज़रूर उड़ेलेंगे; परन्तु उनके व्यावहारिक पक्षों से सुदूर रहेंगे। आदिगुरु शंकराचार्य, मण्डन मिश्र, स्वामी विवेकानन्द, रबिन्द्रनाथ टैगोर आदिक के चिन्तनप्रवाह के वर्णन करने से उनका व्यक्तित्व ‘लघु मानव’-सदृश अनुभव होने लगता है। यही लघुता उनकी प्रभुता के नंगे सच को उजागर करने के लिए पर्याप्त है।
वामपन्थी-दक्षिणपन्थी सचमुच में हमारे साहित्य की सात्त्विकता खा-पी गये है; परन्तु पचा नहीं पा रहे हैं। ऐसा इसलिए कि दोनों ने तटस्थ भाव से कभी न तो चिन्तन-मनन किया और न ही अभिव्यक्ति के धरातल पर लोकसत्ता की महत्ता को स्वीकार किया। यही कारण है कि दोनों का लोक स्वनिर्मित से अधिक कुछ नहीं रहा। ऐसी अवस्था में ‘सह’ और ‘सम’ की अनुभूतिसृष्टि भला कैसे सम्भव हो? वाल्मीकि यदि ‘महाकवि’ कहलाये तो अपने दृष्टि-विस्तार के कारण; पर-कातरता को ‘आत्म पीड़ा’ का विषय बनाने के कारण।
अब तो अनुभव, अनुभावक तथा अनुभूति की अवधारणा ही बदल दी गयी है। यही कारण है कि ऐसे तत्त्व अनुभव करने के लिए ही ‘अनुभव’ करते हैं। उनका अनुभव-जगत् काल्पनिक होता है। वे लोग ‘पंचसितारा होटल’ में टाँगें फैलाकर ‘आमलेट’ सटकाते हुए, प्रेमचन्द की कृतियों के पात्र– होरी, गोबर, धनिया, निर्मला, भीखू आदिक सर्वहारा-वर्ग के प्रतिनिधित्व करनेवाले असहाय-अशक्त पात्रों पर विमर्श करते हैं अथवा बगल में एक अनोखी मुद्रा में बैठी-लेटी ‘गर्लफ्रेण्ड’ के होठों के मुसकान को अपनी आँखों पर साटते हुए, ‘नारी-विमर्श’ पर संवाद कर एक-दूसरे के साथ वैचारिक होड़ करते हुए, स्वयं को ‘श्रेष्ठ विचारक’ सिद्ध करने के लिए हाथापाई की अजीबोगरीब परम्परा का दर्शन कराते हैं।
अब साहित्य पर पद-प्रहार करते हुए, ‘राहित्य’ का महिमा-मण्डन किया जा चुका है। पद्य और गद्यविधाओं की नयी-नयी अवधारणाएँ विवाह-मण्डप में हैं; सामूहिक गठबन्धन की तैयारी कर ली गयी है। वर-वधू कोहबर में क्या-क्या गुल खिलायेंगी? ‘लिव्-इन-रीलेशन’ में ‘कोहबर की शर्त’ नदारद है; पहिलहीं सब भोग लगा चुके रहते हैं।इससे बढ़कर संसार का कोई नारी-विमर्श का विषय हो सकता है क्या– न तुम हारे, न हम जीते? नारी-विमर्श को परवान चढ़ानेवाले कर्त्ता-धर्त्ता नंगी आँखों से एक-दूसरे से सवाल करते हैं और जवाब भी ले लेते हैं।
(सर्वाधिक सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जुलाई, २०२० ईसवी)