--- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आत्मीय अमित्र-मित्रवृन्द!
यहाँ ऐसे व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या (भारी संख्या, बहुत अधिक संख्या प्रयोग अशुद्ध है।) है, जो किसी के भी सम्प्रेषण पर टिप्पणी करने के लिए गुण-अवगुण' को आधार नहीं बनाते, प्रत्युत 'चेहरा' और 'नाम' को आधार बनाते हैं।
अधिकतर लोग तो सम्प्रेषित सामग्री को पढ़ते ही नहीं; कुछ पढ़ते हैं तो समझ पाते नहीं तथा जो कतिपय लोग समझ लेते हैं, उनमें से ९९.५ प्रतिशत लोग ईमानदार प्रतिक्रिया करने से बचते हैं; क्योंकि ऐसे लोग 'अपेक्षाधारी' होते हैं। ऐसे में, प्रतिक्रिया का मूल्य ध्वस्त हो जाता है।
आपको किसी की भी सामग्री जिस रूप में दिखती हो, ठीक उसी रूप का सामग्री के नीचे अपनी दो टूक प्रतिक्रिया करें और उस सम्प्रेषक की अपूर्णता को 'पूर्णता' की ओर ले जाने में अपना सहकार्य करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित-- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२० ईसवी)