आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

ऊपर दी गयी संस्थान की टीन-पट्टिका को ध्यानपूर्वक देखें। वह संस्थान ‘भरद्वाज-आश्रम’, प्रयागराज के सामनेवाले मार्ग पर स्थित है। टीन की यह पट्टिका वर्षों से संस्थान के प्रवेशद्वार के ऊपर लगी हुई है। इस संस्थान में ‘बड़े-बड़े’ अधिकारी भाषण करने के लिए (‘देने के लिए’ अशुद्ध प्रयोग है; क्योंकि यह शब्द क्रियाशीलता का द्योतक है।) जाते हैं; शिक्षा-क्षेत्र के ‘प्रतिष्ठित’ लोग वहाँ जाते हैं; आते-जाते हुए इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, उत्तरप्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, सेण्ट ऐन्थोनी गर्ल्स इण्टर कॉलेज, जगततारन गर्ल्स इण्टर कॉलेज, जगततारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, स्वामी विवेकानन्द विद्याश्रम, सी०एम०पी० डिग्री कॉलेज, ईश्वरशरण डिग्री कॉलेज, श्यामाप्रसाद मुखर्जी डिग्री कॉलेज आदिक पचासों शिक्षण-संस्थानों के-की अध्यापकगण आते-जाते-आती-जाती हैं और नीचे दिखायी जा रही पट्टिका पर दृष्टि भी दौड़ाते-दौड़ाती हैं; परन्तु विचार नहीं करते-करतीं; चिन्तन-अनुचिन्तन नहीं करते-करतीं। यही कारण है कि आज ‘प्रयागराज’ में तथाकथित प्रबुद्धवर्ग में ‘भाषाविकृति’ को ‘संस्कृति’ का रूप देने के प्रति कहीं-कोई ‘चिन्ता’ नहीं दिखती। ऐसे लोग जब ‘भाषा-विषयक’ आयोजनों में निमन्त्रित किये जाते हैं तब बढ़-चढ़कर अपनी ‘शाब्दिक’ जागरूकता का परिचय प्रस्तुत करते हैं।

अब, आप नीचे की सांस्थानिक प्रवेशद्वार-पट्टिका पर दृष्टि-अनुलेपन करें। उसमें सात प्रकार की अशुद्धियाँ हैं :—
पहली– पुर्नवास के स्थान पर ‘पुनर्वास’ होगा।
दूसरी– अँगरेज़ी में लिखे गये संक्षिप्त शब्दों में प्रत्येक अक्षर के नीचे पार्श्व में संक्षेपसूचक चिह्न (.) का प्रयोग होगा।
तीसरी– विकलांग केन्द्र के स्थान पर ‘दिव्यांग-केन्द्र’ होगा; क्योंकि ‘विकलांग’ शब्द को शासन-स्तर पर समाप्त कर ‘दिव्यांग’ किया गया है। व्यवहार स्तर पर शाब्दिक भाव और विचारस्तर पर ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ का प्रयोग ‘हास्यास्पद’ है और सरकार की मूढ़ मति का परिचायक भी।
चौथी– ‘दिव्यांग पुनर्वास’ का अर्थ है, ‘दिव्यांग का पुनर्वास, इसलिए ये दोनों शब्द का समास (षष्ठी तत्पुरुष समास) हो जायेगा अथवा योजकचिह्न (-) का प्रयोग कर विग्रह का रूप दे दिया जायेगा।
पाँचवीं– ‘विकलांग पुनर्वास में प्रयुक्त शब्द ‘पुनर्वास’ के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं है। पुनर्वास का अर्थ है :– ( जिसका घर-बार नष्ट हो गया हो अथवा जो उद्वासित हो गये हों, उन्हें फिर से बसाना। उस केन्द्र.का ऐसा चरित्र है ही नहीं। ऐसे में, यह शब्दप्रयोग अनुपयुक्त है।
छठी– तीसरी पंक्ति में भारद्वाज आश्रम के स्थान पर ‘भरद्वाज-आश्रम’ होगा। भारद्वाज का अर्थ है, ‘भरद्वाज-कुल में उत्पन्न’, जबकि भरद्वाज एक ऋषि का नाम है, जिन्होंने उस आश्रम का निर्माण अपने लिए कराया था और वहीं रहकर दस सहस्र विद्यार्थी गुरु भरद्वाज से ज्ञान ग्रहण करते थे।
सातवीं– ‘भरद्वाज’ और ‘आश्रम’ के मध्य सामासिक चिह्न (-) लगेगा। यह चिह्न षष्ठी तत्पुरुष समास है; क्योंकि यहाँ ‘भरद्वाज-आश्रम’ का अर्थ है, ‘भरद्वाज का आश्रम’। इस दृष्टि से यह ‘सम्बन्ध कारक’ का उदाहरण है।
आठवीं– सबसे नीचे जे.एल.एन.रोड में प्रत्येक अक्षर के सामने जो संक्षेपसूचक चिह्न लगाया गया है, वह अशुद्ध है; क्योंकि वह चिह्न अँगरेज़ी-अक्षरों के नीचे पार्श्व में लगाया जाता है। हिन्दी-विराम चिह्न के अन्तर्गत इसे संक्षेपसूचक चिह्न कहते हैं :– (०)। वहाँ पर जे० एल० एन० रोड (जवाहरलाल नेहरू रोड) होगा।
नौवीं– रोड के स्थान पर ‘मार्ग’ होगा।
दसवीं– इलाहाबाद के स्थान पर ‘प्रयागराज’ होगा; क्योंकि प्रयागराज अधिकृत नाम बन चुका है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ अगस्त, २०२० ईसवी)