प्रशासन से सार्वजनिक देवतन बाबा मंदिर स्थल (विरतिया) को कब्जा मुक्त कराने की मांग

जानते हैं कि कैसे ग्राम बैरीपुर अस्तित्व में आया

इस विषय में जानकारों के मुताबिक हम चलते हैं मनकापुर राजघराने के राजा जय प्रकाश सिंह के पिता राजा पृथ्वीपत सिंह के समय में जब इस दिव्य ग्राम का निर्माण हुआ। राजा पृथ्वीपत सिंह मनकापुर स्टेट की कमान सन् 1854 में संभालते हैं। उसके बाद 1860 के दशक के आसपास उनके यहां पुजारी के रूप में तिवारी पीड़ी खानदान के पूर्वज आनंदी व विनंदी तब का गोरखपुर और आज के देवरिया नामक जिले अंतर्गत आने वाले पिंडी ( चुल्हिया नदौली ) नामक ग्राम सभा से आए थे । दूरी अत्यधिक होने के कारण राजा पृथ्वीपत सिंह जी ने मनकापुर के पास में ही कुछ भूमि देकर उन्हें बसा दिया था। आनंदी, विनंदी पट्टी से आज का बैरीपुर व सरगहिया की तिवारी पट्टी का निर्माण होता है। उसी क्रम में रामनाथ व रामप्रसाद से दो महान आत्माओं का प्राकट्य होता है जो अत्यंत प्रभावशाली और मनकापुर राज घराने में बहुत सम्मानित थे।

राम प्रसाद तिवारी की साधना स्थली आज के ज्ञानीपुर क्षेत्र में होने के कारण इस ग्राम सभा का पूरा नाम ज्ञानीपुर राम प्रसाद के नाम से जाना जाता है, जबकि रामनाथ की साधना स्थली होने के कारण बैरीपुर का पूरा नाम बैरीपुर रामनाथ से जाना जाता है। कालांतर में बैरीपुर से ही कुछ पट्टीदार दुर्गापुर मसकनवा में जाकर बस जाते हैं।

आनंदी, विनंदी पट्टी से तीसरी पट्टी फिर पिंड़ी ग्राम से बैरीपुर रामनाथ में रहने के उद्देश्य आती है और कालांतर में आज के वृतिया (लालवृत) मे आकर के बस जाते हैं उस समय केवल दो लोग आए थे इस प्रकार इस ग्राम में एक अन्य पट्टीदार को मिलाकर कुल 3 लोगों का परिवार रहने लगा।

प्रकाश डालते हैं मंदिर निर्माण पर

विरतिया ग्राम का निर्माण होने से पहले बैरीपुर के तिवारी पटीदार के ही कुछ लोग आकर इस विवादित मंदिर वाले स्थल पर कुछ विवाद के चलते हुए मारपीट करने लगते हैं, जिससे कि एक व्यक्ति की मौत हो जाती है। कालांतर में वह ब्रह्म (बरम) आज के देवतन बाबा बन जाते हैं और दंत कथाओं के अनुसार भूत रूप में सब को परेशान करना शुरू कर देते हैं। इस पर किसी विद्वान के द्वारा बताए जाने पर पट्टीदार के लोग ब्रह्म (बरम) की खुशी एवं मंगल के लिए पूजना शुरू कर देते हैं। कालांतर में उसी स्थल पर रामरंग त्रिपाठी के पूर्वज आकर बस गए और इसी स्थल के पास में रहने लगे। क्षेम कुशल के लिए कुछ पट्टीदारी के लोग साल में एक बार नवरात्र में नवमी के दिन जूतिया चढ़ाने लगे और यह स्थल धीरे धीरे रामरंग त्रिपाठी के द्वारा घर के अंदर करके कब्जा कर लिया गया और वर्तमान समय में एक विशाल घर व बाउंड्री के अंदर घर के रूप में बदल दिया गया। इसे लोग अब देवतन बाबा के मंदिर के रूप जानने लगे है। जिसका सहन/निकास मार्ग गाटा संख्या 270 से होता हुआ सरकारी चकरोड में जाकर मिलता है। अब हर किसी पट्टीदार को उस मंदिर में पूजा पाठ करने में परेशानी होती है। सभी पीड़ी तिवारी पट्टीदार मन्दिर को एक विशेष परिवार से मुक्त कराकर वहां एक ट्रस्ट का निर्माण कर साथ में एक सार्वजनिक पुजारी की नियुक्ति हेतु भारतीय ट्रस्ट एक्ट 1882 एवं माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार डीएम गोंडा से मांग की गयी है कि इस विषय पर कार्यवाही करते हुए मंदिर जो कि आबादी भूमि गाटा संख्या 263 पर स्थित है को कब्जा मुक्त कराया जाए और वहां भारतीय ट्रस्ट एक्ट 1882 के अनुसार एक सार्वजनिक पुजारी की नियुक्ति की जाए। मन्दिर का निकास सरकारी भूमि 270 से होते हुए मुख्य चकरोड गाटा संख्या 269 से जोड़ा जाए, जिससे आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन में कोई परेशानी न हो। गौरतलब है कि पिंडी तिवारी का गोत्र शांडिल्य होने के कारण इनकी कुलदेवी क्षेमकरी माता और कुलदेवता विष्णु जी है जिसका दावा कब्जा करने वाले परिवार (ओम प्रकाश त्रिपाठी, ज्ञान प्रकाश त्रिपाठी आदि) द्वारा उक्त स्थल पर किया जाना बिल्कुल गलत है। क्योंकि कुलदेवी और कुलदेवता की पूजा सबके घरों में बने छोटे मंदिर में होती है, बाहर नहीं।