स्वामी विवेकानन्द ने मनसा-वाचा-कर्मणा लोक जनमानस में आत्माभिमान का अंकुरण किया

11 सितम्बर : विश्व धर्म-संसद में स्वामी विवेकानन्द के उद्बोधन की वर्षगाँठ

डॉ. निर्मल पाण्डेय (लेखक/ इतिहासकार) :

डॉ• निर्मल पाण्डेय

1893 का वर्ष- वैश्विक दृष्टि से एक अविस्मरणीय वर्ष। इस वर्ष एक ओर जहाँ शिकागो के विश्वधर्म सम्मेलन में विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म दर्शन की सर्वसमावेशी स्वर्णिम गौरवशाली परम्परा की ज्ञान पताका फहरायी; वहीं दूसरी ओर इसी साल, लन्दन ट्रेंड बैरिस्टर मोहनदास के. गांधी एक मुक़दमे के सिलसिले में पहली बार दक्षिण अफ्रीका गए, जहाँ उन्होंने अपने राजनीति-विचार-दर्शन और उसे यथार्थ के धरातल पर उतारने के तौर-तरीके और हथियार विकसित किए। 1893 का साल दो संतों का साल रहा। अपने प्रवास से लौटने के बाद दोनों, वे नहीं रहे जो वे जाने से पहले थे, दोनों बदले सो बदला भारत का भाग्य भी ।

दोनों केवल सन्त ही नहीं, दृढ़प्रतिज्ञ महान देशभक्त, ओजस्वी वक्ता, मौलिक विचारक, जनवादी लेखक और अन्तःकरण से शुद्ध मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर विवेकानन्द ने जिस तरह देशवासियों का आह्वान किया और लोक जनमानस ने उन्हें-उनके विचारों को जिस तरह से हाथों-हाथ लिया, स्वतंत्रता के लिए हुए संघर्ष में गर्व और आत्मविश्वास से भरा बीसवीं सदी का भारत इस बात का प्रमाण बना।

दरअसल, गांधीजी की मॉस-पॉलिटिक्स के मूल में जो जन-गुबार था, उसमे शामिल हर शख्स के हृदय में विवेकानन्द का आह्वान ही रक्त संचार का जिम्मेदार था।

उस देश-काल में जब राजनीति-समाज-आध्यात्म के स्तर पर देश आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा था, उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में स्वामी विवेकानन्द ने मनसा-वाचा-कर्मणा लोक जनमानस में आत्माभिमान का अंकुरण किया; उसी आत्मविश्वास और गौरव के भाव ने बीसवीं सदी के भारत में व्यापक जनान्दोलनों की उर्वर जमीन तैयार की ।

धर्मसंसद के अपने उद्बोधन में विवेकानन्द ने कहा,
‘रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम…
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव…’
अर्थात – जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, परंतु सभी भगवान तक ही जाते हैं।

सही मायनों में स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय आध्यात्म को लौकिक अर्थ में प्रयोग कर लोक-जनमानस को लक्ष्योन्मुख रहने को प्रेरित-उत्प्रेरित किया। बुद्ध, महावीर और अम्बेडकर की तरह विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म की कमियों से आहत हो पलायनवादी रास्ता नहीं अख्तियार किया अपितु शंकराचार्य की तरह उत्थानवादी नजरिया अपनाया । उनका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक संतुष्टि तक पहुंचना ही नहीं था, बल्कि वह हिंदूधर्म के नैतिक बल को एक उत्कृष्ट और क्रांतिकारी रूप से तार्किक आधार मुहैया कराना चाहते थे, जिस पर चलकर समाज की व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके ।

आप भी – उठिए और जगाइए स्वयं को! जगाइए ऐसे कि आप भी हिन्दू धर्म, संस्कृति, आध्यात्म, दर्शन का चतुर्दिक विजय पताका फहराने वाले योद्धा-सन्यासी स्वामी विवेकानन्द के दिखाए मार्ग पर चल पाएं ।
सो आइए, राजनीति-समाज-आध्यात्म का लोकोन्मुख का पथ अपनाएं।