जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद)

कन्हैया बस यही विनती मेरी स्वीकार कर लेना,
मेरी डगमग-सी नैया को ये दरिया पार कर देना।
सबकी बिगड़ी बनाते हो ,
सभी को राहें दिखाते हो।
कहीं गोपी सङ्ग लीला,
कहीं माखन चुराते हो।
मेरी आँखों में मोहन, अँधेरा जब कभी छाए
बस यही विनती मेरे गिरधर,प्रकाशित राह कर देना।
मेरी डगमग-सी………………….. …………………
कभी गीता सुनाते हो,
कभी मुरली बजाते हो।
कभी एक साथ ही मोहन,
कई रचना रचाते हो।
मेरे हाथों अगर कोई बुरा व्यवहार हो जाये,
क्षमा मैं माँग लूँ कान्हा, मेरे मन में ये भाव भर देना।
मेरी डगमग-सी………………….. …………………
करो तुम प्रेम राधा से,
रुक्मिणी से भी निभाते हो।
सताते माँ यशोदा को,
मगर देवकी माँ को न भुलाते हो।
अगर मैं धर्मच्युत होऊं या अपने फर्ज़ से भागूँ,
बस यही विनती बिहारी से, मेरी मति ठीक कर देना,
मेरी डगमग-सी………………….. …………………
तुम मीरा के गिरधर नागर,
तुम्हीं करुणा के सागर हो।
सुदामा है तुम्हें अतिप्रिय,
तुम्हीं सत्यभामा के काजल हो।
अगर मैं प्रेम बिसराउँ, अगर बेईमान हो जाऊँ,
बस यही विनती मेरी गोपेश्वर, मेरा उद्धार कर देना,
मेरी डगमग-सी………………….. …………………