भारत-भारतीयता तथा सनातन संकट में!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- 


काँग्रेस और साम्यवादी अलग-अलग विचारधारा के रहे हैं और उनके विचार-व्यवहार कभी मौलिक नहीं रहे हैं, इसीलिए आदर्शपूर्ण सारे सिद्धान्तों को चुल्लू-भर पानी में डुबोते हुए, दोनों ने एक-दूसरे के साथ अप्रत्याशित गठबन्धन किया था। काँग्रेस का ही वह अभारतीय चरित्र था, जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। उस दल का अपना मौलिक चिन्तन नहीं था; भारतीय परिवेश की परख होते हुए भी उस वातावरण को, स्वार्थवश समझने की सामर्थ्य उसमें नहीं थी ; राष्ट्रहित के प्रति कर्त्तव्यपरायणता नहीं थी, वरना भारत का संविधान ‘संकलित’ (एसेम्बिल्ड) नहीं होता, ‘मौलिक’ (ब्राण्डेड) होता। यही कारण है कि हमारा संविधान अब अपाहिज़ होता जा रहा है और यहाँ का लोकतन्त्र ‘दोहरा’ चरित्र जी रहा है। देश के संविधान में मौलिकता रहती; भारतीयता रहती तो यह देश ” India that is ‘Bharata” नहीं कहलाता और व्यवहार में भारत को अभारतीय भाषा में ‘इण्डिया’ नहीं कहा जाता। अफ़सोस! अब ‘न्यू इण्डिया’ कहनेवाले भी पैदा हो गये हैं।
उक्त प्रकार के साम्यवादी भारत की खाते आये हैं; भारत की ज़मीं पर सोते आये हैं तथा अय्याशी करते आये हैं। उसके बाद भी रूस और चीन को गले लगाते आये हैं, जिसका परिणाम रहा है कि उनके साहित्यकार-समालोचक और उसी विरादरी के तमाम लपड़झंगे ‘सोवियतलैण्ड एवार्ड’ , ‘ज्ञानपीठ’, ‘मध्यप्रदेश के सारे शासकीय पुरस्कार’, ‘साहित्य एकेडेमी पुरस्कार’, ‘सरस्वती-व्यास सम्मान’, ‘केन्द्रीय हिन्दी संस्थान’, आगरा, ‘उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान’, लखनऊ आदिक के बड़ी धनराशिवाले पुरस्कारों पर हाथ साफ़ कर चुके हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन’ के शासनकाल में तथाकथित ‘नामवरों’, ‘स्वनामधन्यों’ ने देश की साहित्य, संस्कृति, कलादिक क्षेत्रों में ‘महा अतिवाद’ का परिचय दिया था। ऐसे में, ‘गीता’ के कर्मवादी आचरण के साथ वे स्वयं को जोड़ सकने की पात्रता खो चुके हैं।
वहीं यह कैसा विरोधाभास— जब कृष्ण का मन्दिर देखेगे; उनकी मूर्त्तियाँ देखेंगे तब सपरिवार करबद्ध मुद्रा की स्थिति में आ जायेंगे। बाहर जायेंगे व्याख्यान करने तो अपनी बात की पुष्टि के लिए ”कर्मणेवाधिकारस्ते…..” को बैसाखी के रूप में इस्तेमाल करेंगे।
आक् थू!
विश्वासघातियो! उसी कृष्ण के वचन ‘गीता’ को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित कराने में साथ देने से तुम सब कतरा रहे हो?…!
वहीं ‘भारतीय जनता पार्टी’ के अस्तित्व में आने के लगभग दो दशकों के बाद उस पार्टी और उसके अघोषित राजनीतिक सहयोगी संघटन-द्वय : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद् ने ‘सनातन’, ‘शाश्वत’ तथा ‘चिरन्तन’ जीवनधारा के समक्ष आक्रामक रूप में अस्तित्वहीन शब्द ‘हिन्दू और हिन्दुत्व’ का अवरोध ला खड़ा किया है। ‘सनातन’ सभी का अपना है, जो ‘व्यष्टि’ से ‘समष्टि’ और ‘एकीयता’ से ‘सर्वदेशीयता’ की अन्तर्यात्रा कराता-रहता है। ऐसे लोग श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मवाद से सुदूर हैं।
आज भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दलों की कुल १८ राज्यों में सरकारें हैं और उन सभी राज्यों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ-विश्व हिन्दू परिषद् से जुड़े सैकड़ों की संख्या में ऐसे अयोग्य लोग हैं, जिन्हें योग्यतर लोग की उपेक्षा करते हुए, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, कलादिक क्षेत्रों के ‘शीर्षस्थ’ पद दिये गये हैं। मोटी रक़्मवाले सारे पुरस्कार अब उनकी आदमी-औरत पा रही हैं। इतना ही नहीं, केन्द्र-शासन के विभिन्न मन्त्रालयों-द्वारा संचालित ‘मलाईदार’ विभागों में इसी प्रकार के अयोग्य लोग बैठाये गये हैं।
ऐसे में पहले की तुलना में अब और विकृति दिखायी दे रही है। ऐसे ही लोग अय्याशी कर रहे हैं क्योंकि वे कर्मधरातल पर शून्य दिख रहे हैं।
दूसरी ओर, वर्तमान प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी को ‘भारत’ शब्द को पचा पाने में कष्ट हो रहा है, तभी ‘न्यू इण्डिया’ की माला अहर्निश जपने में व्यस्त हैं। आश्चर्य है, भारतीय जनता पार्टी का एक अन्य सहयोगी संघटन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ ‘भारतीयता’ पर लगाये जानेवाले ग्रहण के प्रति चिन्तित नहीं दिखता?
ऐसे में, अब एक स्वर में ‘भारत’ शब्द को बदलकर ग़ुलाम-मानसिकता का परिचय देकर, ‘न्यू इण्डिया’ का नामकरण करनेवालों का मुखर विरोध करना होगा क्योंकि ‘इसप्रकार’ का उन्मादपूर्ण कृत्य हमारे राष्ट्रवाद के लिए घातक सिद्ध होगा।