पं० बालकृष्ण भट्ट एक कुशल संस्कृतिधर्मी भी थे : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
“जीवन के हर क्षेत्र में प्रयाग और इलाहाबाद का प्रभावपूर्ण वर्चस्व रहा है। यहाँ साहित्यसर्जकों की दृष्टि और सृष्टि देखते ही बनती है। इसी कड़ी में अहियापुर मुहल्ले में २३ जून, १८४४ ई० को जन्म लेनेवाले पं० बालकृष्ण भट्ट ने हिन्दी-साहित्य में खड़ीबोली गद्य की प्रतिष्ठा की थी।
उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर ‘साहित्य सुमन’, ‘भट्ट निबन्धावली’, ‘सौ अजान एक सुजान’, ‘नूतन ब्रह्मचारी’, ‘बालविवाह’, ‘चन्द्रसेन’ आदिक कृतियों का प्रणयन कर, हिन्दीसाहित्य की श्रीवृद्धि की है। उन्होंने हिन्दी-पत्रकारिता के उस प्रारम्भिक युग में उसे आधुनिकता के अनुकूल बनाकर, हिन्दी-पत्रकारिता का उन्नयन किया था। भट्ट जी एक कुशल संस्कृतिधर्मी भी थे। १८७७ ई० में उन्होंने ‘हिन्दी नाट्य समिति’ की स्थापना की थी।”
उपर्युक्त विचार भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने ‘ज्योत्स्ना’ संस्था की ओर से कीडगंज, प्रयागराज में आयोजित पं० बालकृष्ण भट्ट के जन्मतिथि-समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ० मोहिनी यादव ने कहा,”वास्तव में, इलाहाबाद के हिन्दी-साहित्य का क्रमबद्ध इतिहास पं० बालकृष्ण भट्ट से आरम्भ होता है। उन्होंने हिन्दी-गद्य का प्रचार करने के लिए अपनी संस्था ‘हिन्दी वर्द्धिनी सभा’ की ओर से ‘हिन्दी प्रदीप’ का प्रकाशन किया था।” डॉ० निर्मल खत्री ने बताया,”भट्ट जी ने ३२ वर्षों तक सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक प्रकार के निबन्धों, उपन्यासों, नाटकों आदिक का प्रचार किया था।”
डॉ० बबिता मेहरोत्रा ने कहा,” भट्ट जी का व्यक्तित्व क्रान्तिकारिक था। बंगाल-विभाजन के समय ‘हिन्दी प्रदीप’ के माध्यम से उन्होंने जो विद्रोही तेवर दिखाये थे, अँगरेजी हुकूमत भीतर तक सिहर गयी थी।” इनके अतिरिक्त रसिकलाल वर्मा, डॉ० योगेन्द्र शर्मा, डॉ० नचिकेता, आरुषि, माया आदिक ने विचार व्यक्त किये थे। दीपक ठाकुर ने समारोह का संयोजन किया था और रचना उप्रैती ने संचालन।