राम वशिष्ठ (युवा चिन्तक व फिल्म निर्देशक) :
यह ब्रह्मांड बहुत बड़ा है लेकिन जीवन केवल पृथ्वी पर है । सभी ग्रहों में पृथ्वी का पर्यावरण जीवन के अनुकुल है इसलिए इस ग्रह पर जीवन फल फूल रहा है । लेकिन अब पृथ्वी पर बदलाव होने लगे है । जगह जगह फैला कूड़ा-कचरा , यहां वहां गंदगी के ढेर, कम होते जंगल और बेघर होकर मरते जीव जन्तु , हर रोज पेड़ पौधों की जगह पर फैलता कंक्रीट का जंगल , सड़क पर धूल – धुआँ और शोरगुल, दम तोड़ती नदियाँ और गंदगी से पटे नाले ।
मौसम का चक्र बदल रहा है और सामान्य तापमान बढ़ रहा है । जलस्रोत सूख रहे है और ग्लेशियर पिघल रहे है , कभी भी तबाही आ सकती है । जमीनें बंजर हो रही है और जल संकट बढ़ रहा है । कूड़े के ढेर अब गंदगी के पहाड़ बन रहे है और यह पृथ्वी धीरे – धीरे एक बड़े कूड़ेदान में तब्दील हो रही है ।
आज विश्व पर्यावरण दिवस है , 5 जून को हर साल होता है । अभी तो कोरोना का डर है, अन्यथा आज पर्यावरण संरक्षण पर जगह – जगह विचार गोष्ठी होती, सभाएं होती और पर्यावरण को बचाने की कसमें उठायी जाती । अब यह एक रस्म अदायगी बन चुका है , ऐसा हर साल 5 जून को होता है । लेकिन अगले दिन 6 जून को हम सब भूल जाते है । हमारे इसी रवैये ने नये ख़तरे पैदा कर दिये है । नई – नई बीमारियां जन्म ले रही है , अभी कोरोना है कल कुछ और हो सकती है ।
लेकिन कोरोना ने पर्यावरण को बदला है । लॉकडाउन के कारण जब यातायात बन्द हुआ , फैक्ट्रियां बंद हुई और लोग बाहर नही निकले तो ऐसा कुछ देखने को मिला जो अभूतपूर्व था ।
दिल्ली जैसे शहर जो गैस चैम्बर बन चुके थे , उनकी हवा शुद्ध हो गयी । नदियों का पानी साफ हो गया । जिस यमुना को साफ रखने के लिये भारी भरकम पैसा खर्च करने के बाद भी वो साफ नही हो सकी, वो लॉकडाउन में साफ हो गयी । गंगा का पानी न केवल साफ हुआ , कुछ जगह पर पीने लायक हो गया । डॉल्फिन जो अपना किनारा छोड़कर चली गई थी वो वापस आ गयी । मानव के दखल के कारण जो जानवर जंगल में भयभीत रहने लगे थे वो निर्भय सड़कों पर घूमते दिखाई दिये । कभी धूल और बेमौसम कोहरे से 100 मीटर दूर लगा खंबा भी साफ नजर नहीं आता था , आज घर की छत से हजारों किमी दूर पहाडों के सुन्दर नजारे दिख रहे है ।
हमें अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने के लिए पृथ्वी के बाहरी वायुमण्डल में ओजोन की एक परत है जो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण क्षतिग्रस्त हो गयी थी , उसका बहुत बड़ा हिस्सा रिपेयर हो गया है , ऐसा सुनने में आ रहा है । इससे तो साफ ज़ाहिर हो रहा है कि पर्यावरण को बिगाड़ने का जिम्मेदार मानव है । भले ही कोरोना महामारी की वजह से लेकिन मानव घर में दुबककर बैठा था तो पर्यावरण में सुधार हो रहा था ।
तो क्या करें ? पर्यावरण को बचाने के लिए हर साल 5 जून के बाद 15 दिन का लॉकडाउन कर दिया जाये ? ये तरीका कारगर तो होगा , लेकिन ये सही तरीका नही है शायद । तो फिर क्या करें ?
हमें अपने तौर तरीके बदलने ही होंगे , नही तो प्रकृति एक दिन अपने पर्यावरण को बचाने के लिए खुद एक बड़ा लॉकडाउन कर देगी । यह वक्त संभलने का है , नहीं तो ये मानव जाति वो लॉकडाउन नही झेल सकेगी जो प्रकृति खुद लगायेगी !