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तीनों कृषि क़ानून पर अब भी दिखते संशय के उमड़ते-घुमड़ते बादल!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

लगभग एक वर्ष से हमारे अन्नदाता आन्दोलनरत हैं; उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता रहा है; ख़ालिस्तानी, आतंकी, पाकिस्तानी, टुकड़े-टुकड़े गैंग और न जाने क्या-क्या कहा जाता रहा; लगभग ७०० किसानों को अपने प्राण की आहुति करनी पड़ी थी; किसानों के आन्दोलन-मार्ग पर लोहे के नुकीले अवरोधक लगाये गये थे; सरकारी सफ़ेदपोशों के माध्यम से हर स्तर पर किसान धमकाये जाते रहे; कई किसानों के विरुद्ध फ़र्ज़ी क़िस्म के मुक़द्दमे चलाये जा रहे हैं; कई किसान जेलों में बन्द हैं; उनके आन्दोलन को कमज़ोर करने के लिए नाना प्रकार के निर्मम उपक्रम खड़े किये जाते रहे हैं; लखीमपुर खीरी में निर्दोष किसानों पर सरकारी जीप चढ़ाकर उन्हें रौंदवा दिया गया था। जब उसका प्रधान आरोपित केन्द्रीय गृहराज्यमन्त्री का बेटा निकला तब उस प्रकरण को दबाने की पूरी कोशिश की जा रही है। इसे देश का किसान भला कैसे भूल सकता है। अब, जब अनेक राज्यों की विधानसभा के चुनाव समीप आ चुके हैं तब वह मोदी-सरकार, जो एक बार भी किसानों से भेंट करने से कतराती आ रही थी, आज वही क्षमायाचक की मुद्रा में घुटने टेकने के लिए बाध्य हो चुकी है।

बेशक, १९ नवम्बर को पूर्वाह्न ९ बजे अकस्मात् प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की इस घोषणा के बाद भी, ” मैं (यहाँ ‘मैंने’ का प्रयोग होगा।) आज देशवासियों से क्षमा माँगते हुए, तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने का निर्णय किया है”, किसान अपने आन्दोलन के प्रति दृढ़ बने हुए हैं। ऐसा इसलिए है कि उन्हें नरेन्द्र मोदी के कथन के प्रति विश्वास नहीं है; क्योंकि देश के प्रथम श्रेणी के ज़ुम्लेबाज़’ के रूप में उनकी स्थापना हो चुकी है।

सबसे बड़ी बात, माया रचने में मोदी का कोई जवाब नहीं रहा है। यही कारण है कि किसान-नेता राकेश टिकैत ने सुस्पष्ट कर दिया है, “हमारा आन्दोलन अभी ख़त्म नहीं होगा। जब तक ये क़ानून संसद्-सत्र में क़ानूनी तरीक़े से समाप्त नहीं होंगे और हमारी अन्य माँगें नहीं मानी जायेंगी तब तक हमारा आन्दोलन जारी रहेगा।”

भारतीय किसान इस वास्तविकता से अवगत हैं कि यह मात्र ‘चुनावी’ घोषणा है। कुछ उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड तथा पंजाब राज्यों के चुनाव बहुत नज़दीक आ चुके हैं। पंजाब में अपने पाँव रखने को तरसती आ रही भारतीय जनता पार्टी वहाँ अब भी अपनी बुरी स्थिति देख रही है; वहीं पश्चिमी उत्तरप्रदेश में १३२ सीटों से उसका जनमत बहुत हद तक खिसक चुका है; हरियाणा तथा अन्य राज्यों में भी उसकी साख कलंकित हो चुकी है।

मोदी ने अपनी घोषणा की मुहूर्त्त गुरु नानकदेव की जन्मतिथि पर आयोजित होनेवाले ‘प्रकाश-पर्व’ पर इसलिए निकलवाया था कि कृषक-आन्दोलन के मूल में सिक्ख-समुदाय ही रहा है और उसकी मूल धार्मिक भावना के साथ जुड़कर आन्दोलन समाप्त कराया जाये। सिक्ख-समुदाय यह अच्छी तरह से जान चुका है कि मोदी-सरकार अवसर को भुनाने में माहिर है। यदि किसानों के प्रति इतनी ही सहानुभूति थी तो किसानों को प्रतिकूल मौसम में कितना कष्ट सहना पड़ा है; अपने घर-द्वार छोड़कर सीमाओं पर आबाल वृद्ध नर-नारी पूरी दृढ़ता के साथ आन्दोलनरत हैं, इनकी ओर मोदी की विनम्र दृष्टि क्यों नहीं गयी थी?

सरकार का आन्दोलनरत किसानों के प्रति जो अमानवीय आचरण था, उसे कोई किसान नहीं भूल पायेगा। जिस निर्ममता के साथ डीज़ल के मूल्य में लगातार बढ़ोतरी कराकर मोदी-सरकार किसानों और आमजन की कमर तोड़कर अपने अहंकार का परिचय देती आ रही है, उसे देश की जनता भूली नहीं है।

रही बात नरेन्द्र मोदी की किसानों से मुआफ़ीनामे की तो अचानक उस मोदी को ऐसा अप्रत्याशित निर्णय क्यों करना पड़ा था, जो लगभग एक वर्ष से नाना प्रकार के कष्ट को सहते हुए, आन्दोलनरत किसानों के पक्ष में ऐसा एक भी शब्द नहीं कहा था, जिसे सुन-समझकर उनके हृदय को संतोष होता। हो सकता है, केदारनाथ-दर्शन के समय उनकी सुषुप्त ज्ञानेन्द्रिय चेतनामयी हो गयी हो।

“सरकार तीनों क़ानून वापस नहीं लेगी”– मोदी और ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ के सभी कर्मचारी यही कहते रहे। इतना ही नहीं, न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा पर मोदी-सरकार अभी तक मौन बनी हुई है; मण्डियों की दशा-दिशा पर उसका रुख़ ‘उदासीन’ बना हुआ है। दूसरी ओर, १९ नवम्बर से कृषिमन्त्री की सुषुप्त चेतना जाग्रत् हुई है, तभी तो वे नरेन्द्र मोदी की उपर्युक्त घोषणा पर उनकी पीठ ठोंकते हुए सार्वजनिक हुए हैं। इससे पहले वे भी किसी अज्ञात कन्दरा में घुसे हुए थे।

स्मरणीय है कि तीनों कृषि क़ानूनों को जून, २०२० ई० में सबसे पहले अध्यादेश के रूप में लाया गया था। उसी समय पंजाब में अध्यादेश के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया था। सरकार के किसान-विरोधी निर्णय को समझते हुए, देशभर के किसान संघटित होने लगे थे। उसके बाद जब संसद् का मानसून-सत्र आरम्भ किया गया था तब सितम्बर के मानसून-सत्र में संसद् के दोनों सदन में बिल पारित करवाकर और उन पर राष्ट्रपति का हस्ताक्षर करवाकर क़ानून बनवा दिया गया था।

१९ नवम्बर को ही भारतीय जनता पार्टी के नेता शान्त प्रकाश जाटव ने ‘एनडीटीवी’ की ओर से आयोजित एक परिचर्चा में कहा है– यह न समझ लिया जाये कि किसान बिल वापस लिये गये हैं। सरकार-द्वारा बिल को किसी-न-किसी रूप में फिर से पास किया जायेगा। क्या यह नरेन्द्र मोदी की पार्टी के इस नेता का बयान मोदी की घोषणा को शक की नज़र से देखने के लिए किसानों को बाध्य नहीं कर रहा है?

नरेन्द्र मोदी के ये कथन– हमने ग्रामीण बाज़ारों को मज़्बूत किया है; छोटे किसानों के लिए कई योजनाएँ लायी गयी हैं; किसानों के लिए बजट-आवण्टन पाँच गुना बढ़ गया है; हमने सूक्ष्म सिंचाई के लिए भी धन दोगुना कर दिया है– व्यावहारिक रूप में कहीं दिख रहे हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ के लोग मिथ्या आँकड़ों की जाल में देशवासियों को फँसाने में सिद्धहस्त रहे हैं।

२८ नवम्बर, २०२० ईसवी से आन्दोलनरत हमारे अन्नदाता, जो ‘मोदी-सरकार ऐण्ड कम्पनी’ की निगाहों में आतंकवादी, ख़ालिस्तानी, टुकड़े-टुकड़े गैंग, नक्सली, नक़्ली किसान, आन्दोलनजीवी, देशद्रोही और न जाने किन-किन नकारात्मक उपाधियों से विभूषित होते आ रहे हैं, अब भी अपने निर्णय के प्रति दृढ़ हैं। वे तीनों कृषि क़ानून वापस कराने की घोषणा कराने में फ़िलहाल सफल रहे हैं; किन्तु अपने खाद्यान्न पर न्यूनतम समर्थन-मूल्य पर क़ानूनी गारण्टी की माँग पर दिल्ली के कई सीमावर्ती स्थानों पर डेरा डाले हुए हैं।

वक़्त बतायेगा, ऊँट कौन-सा करवट लेगा?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)