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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की ‘निबन्ध’ के प्रति अवधारणा

चित्र विवरण : पिछले एक दशक में, जिस क्रम में पुस्तकें प्रकाशित होती गयी थीं, उसी क्रम में (यहाँ 'से' का प्रयोग अशुद्ध है।) यहाँ प्रस्तुत हैं। नीचे की तीन पुस्तकें 'प्रभात प्रकाशन', दिल्ली से एक साथ प्रकाशित हुई थीं, जबकि शेष पुस्तकों के प्रकाशक अलग-अलग थे।

वस्तुत: निबन्ध-लेखन एक ऐसा कर्म है, जो लेखक को समग्रता की ओर ले जाता है। जिसने निबन्ध-लेखन कर लिया हो, उसे किसी भी विषय को ‘हस्तामलक’ बना लेने की सामर्थ्य अर्जित हो जाती है।

निबन्ध को यदि मैं ‘बुद्धि-विलास’ कहूँ तो इसे न तो ‘अतिशयोक्ति’ की संज्ञा मिलनी चाहिए और न ही ‘वक्रोक्ति’ की; क्योंकि सम्बद्ध परिवेश की भाषा की समझ और उस पर पकड़ रखनेवाला शब्दशिल्पी ‘निबन्ध’ के माध्यम से ‘मनचाहा खेल’ खेल सकता है। अस्तु, निबन्धकार जीवन का ‘तटस्थ द्रष्टा’ होता है।

गद्यविधा के अन्तर्गत निबन्ध-विषय पर दस कृतियों का प्रणयन करने के उपरान्त मैंने यह निष्पत्ति प्राप्त की है– निबन्ध के माध्यम से निबन्धकार अपने व्यक्तित्व का निचोड़ प्रस्तुत करता है, जो उसके अन्त:करण के सात्त्व को सम्यक् रूपेण रेखांकित करता है।


चित्र-विवरण– पिछले एक दशक में, जिस क्रम में पुस्तकें प्रकाशित होती गयी थीं, उसी क्रम में (यहाँ ‘से’ का प्रयोग अशुद्ध है।) यहाँ प्रस्तुत हैं। नीचे की तीन पुस्तकें ‘प्रभात प्रकाशन’, दिल्ली से एक साथ प्रकाशित हुई थीं, जबकि शेष पुस्तकों के प्रकाशक अलग-अलग थे।


(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ मई, २०२१ ईसवी।)