राज चौहान (ब्यूरो प्रमुख हरदोई)
- भावनाओं के आगे देश का संविधान शून्य आ रहा नज़र
पद्मावती विवाद मे संविधान बाद में पहले भावनाओं पर हो रहा ज़ोर
पद्मावती विवाद से करणी सेना और भंसाली दोनों को लाभ मिल रहा है। उनकी राजनैतिक ताकत बढ़ रही है और भंसाली की फ़िल्म का नाम बढ़ रहा है। विवाद इस कदर बढ़ा कि फ़िल्म पद्मावती बिना देखे ही ज़िले दर ज़िले राज्य दर राज्य फ़िल्म को लेकर राजपूताना सड़कों पर आ खड़ा हो गया ये कहते हुए कि इतिहास से छेड़ छाड़ हुई है।
सवाल यहां खड़ा होता कि तथ्य हैं नहीं, फ़िल्म देखी नहीं, पद्मावती का ज़िक्र भी एक कविता के द्वारा हुआ और उन्हें वहां से जाना जाने लगा । ख़ैर वो एक अलग विषय है, हम बात करेंगे आखिर पद्मावती का विरोध क्यों ? क्या देश का कानून मायने नही रखता या फिर कानून हाथ मे लेने की आदत पड़ चुकी है ? यह पहली फ़िल्म नहीं जिसका भारत देश में विरोध हुआ । इससे पहले उड़ता पंजाब, माई नेम इज़ खान, बार्डर जैसी अन्य फिल्मों का भी विरोध हुआ और सेंसर बोर्ड ने उन्हें पास किया । बाकायदा सिनेमाघरों में लगीं और फिल्में कामयाब हुई ।
सवाल ये उठता है कि क्या संविधान से बढ़कर है भावनाएं ? क्या भावनाओं के आगे संविधान का कोई महत्व नहीं ? या फिर राजनीतिक गलियारे में खुद को चमकाने की कोशिश की जा रही है । सवाल बहुतेरे हैं, पर पद्मावती की तरह विवादों की बेड़ियों में जकड़ से गये हैं । सवाल ये भी है कि आखिर कानून चुप क्यों रहता है ? पद्मावती की शूटिंग के दौरान हुई तोड़फोड़ को लेकर करणी सेना पर कोई मामला दर्ज क्यों नहीं हुआ ? राजनीतिक गलियारे में हर कोई अपनी चमकाने की कोशिश में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है । भारत के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री के लिए भी शायद संविधान अब मायने नही रखता । तभी तो पद्मावती फ़िल्म को लेकर हाल ही में एक स्टेटमेंट दिया कि लोगों की भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए । इसीलिए फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही उत्तर प्रदेश में बैन कर दी गयी । अब तो आप कह सकते है संविधान भावनाओ से चलता है । इतना ही नहीं भारत के तीन केंद्रीय मंत्री भी भावनाओ में बंधे नज़र आ रहे हैं । शायद समझना मुश्किल नहीं होगा कि संसद भवन में बैठे मंत्री या राज्यों के मुख्यमंत्री संविधान नहीं बल्कि भावनाओं में विश्वास रखते हैं ।
ज़िक्र सेंसर बोर्ड का भी होना चाहिए… इंतजार करिये… ज़रूर करेंगे।
राज®✍