हे ! ‘ चीनी जी’ शिनपिंग ,
तुमने यह क्या कर डाला ?
गतिमान प्रगति-पथ देशों को,
‘वूहान’ बना डाला ।
सब शहर बन्द, घर- गाँव बन्द ,
बाजार, माल, दूकान बन्द ।
जीवन्त मार्गों, गलियों ,
तक को वीरान बना डाला ।।
स्कूलों में बच्चों की तोतिल,
किलकारी मौन हुई ।
चहल-पहल पन्थागारों की,
ना जाने अब कहाँ गई ।।
कोविड-19 के डर ने सबको,
भय- आक्रान्त बना डाला ।
संक्रमण बचाने हेतु सब कहीं,
डाल दिया सबने ताला ।।
पशु, पक्षी, बन्दर बेचैन,
सभी वे मुझसे कहते हैं ?
किसकी लग गई कुदृष्टि,
सभी जो छिपकर बैठे हैं ।
चमगादड़, चूहे , कुत्ते ,पक्षी ,
बिच्छू सर्पों को खा डाला ।
‘विश्व विजय ‘ पाने को तुमने,
‘जैविक हथियार’ बना डाला ।।
तेरी ‘चीनी- चमचम’ ने,
दुनिया भर को आकृष्ट किया ।
व्यापारिक दुरभि संधियों से,
दुस्तर व्याघाती कष्ट दिया ।।
‘व्यापार विश्व’ पर तेरा हो ,
कंटिल षड्यंत्र रचा डाला ।
‘द ग्रेट चाइना’ बन जाये ,
तुमने दुःस्वांग रचा डाला ।।
तुम कुटिल विधुर-मुस्कान ,
लिये इतराते रहते हो ।
तुम अभिमानी, निदय-ह्रदय,
सबको धमकाते रहते हो ।।
तेरी दुराकांक्षाओं ने,
सारा अर्थार्थ रौंद डाला ।
महाशक्तियों तक को भी,
तुमने असहाय बना डाला ।।
तुम डाटा, दवा-शोध पर भी,
साइबर अपराध कराते हो ।
डब्लू० एच० ओ० के ऊपर भी ,
तानाशाही दिखलाते हो ।।
दुनिया हो तेरे चुंगुल में,
दुर्मुख ! दुर्व्यूह बना डाला ।
यू०के०, इटली, स्पेन, यू०एस०ए०,
तक को शमशान बना डाला ।।
गतिमान प्रगति पथ देशों को,
वूहान बना डाला ।।
हे’ चीनी जी’ शिनपिंग,
तुमने यह क्या कर डाला ?
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदै, श्रमिक दिवस
बइशाख अष्टमी- चन्द्र
01/05/2020