डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में अनुराग-आसक्ति, प्रेम, प्रीति (प्यार), मोह-व्यामोह, स्नेह, प्रणय सद्भाव

अनुराग-आसक्ति :—

आइए! पहले ‘अनुराग’ शब्द की व्युत्पत्ति को समझें :—
यह संस्कृत का पुल्लिंग-शब्द है। इसमें ‘अनु’ उपसर्ग है और ‘रञ्ज्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय प्रयुक्त कर, ‘राग’ का सर्जन किया गया है। रञ्ज् का अर्थ है, रँगनेवाला। इस प्रकार ‘अनुराग’ शब्द की व्युत्पत्ति होती है। इसमें किसी विषय अथवा व्यक्ति की ओर निर्विकार भाव से मन लगना ही ‘अनुराग’ की श्रेणी में आता है। इसे अँगरेजी में ‘एफेक्शन’ कहते हैं। इसका प्रयोग उदात्त भाव-विचार, चिन्तन-अनुचिन्तन के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। यह एकपक्षीय हो सकता है और द्विपक्षीय भी।
‘अनुराग’ का अतिरिक्त रूप ‘आसक्ति’ है। आसक्ति में मन किसी व्यक्ति अथवा विषय में लीन हो जाता है और शीघ्र पृथक् नहीं हो पाता। यही कारण है कि आसक्ति पूर्णत: एकपक्षीय होती है।

प्रेम :—-

यह संस्कृत का पुल्लिंग-शब्द है। ‘प्रिय’ में ‘इमनिच’ के संयोग से यह शब्द बना है। ‘प्रेम’ एक व्यापक शब्द है। ईश्वर-प्रेम से लेकर कामासक्ति तक के क्षेत्रों में इसका विस्तार है। यहाँ जानने-योग्य यह है कि ‘प्रेम’ सदैव पवित्र है; इसमें ‘शुभ’ की भावना निहित है; यह स्वार्थ-रहित है। प्रेम की अवधारणा यह है कि मनुष्य इसके माध्यम से ‘सुख’ और ‘संतोष’ की ही कामना करता है। मनुष्य जन्मभूमि, मातृभूमि, माता-पिता, सन्तान, बन्धु-बान्धव इत्यादिक के प्रति ‘प्रेम’ करता है; ‘संगीत, साहित्य, कला आदिक के प्रति प्रेम करता है। प्रेम वस्तुत: रूप, गुणादिक संस्कारों के प्रभाव से प्रस्फुटित होता है। उसमें कहीं पर भी ‘वासना’ का स्थान नहीं है। प्रेम में यदि ‘काम’ का भाव आता हो तो वह भाव पवित्रतापूर्ण होता है। संतान-प्राप्ति हेतु ‘प्रेम’ का आश्रय लिया जाता है क्योंकि ऐसा करके मनुष्य सृष्टि-संवर्द्धन में अपना योगदान करता है।

प्रीति (प्यार) :—

यह संस्कृत-भाषा का स्त्रीलिंग-शब्द है। ‘प्री’ धातु में ‘क्तिन्’ प्रत्यय के संयोग से ‘प्रीति’ शब्द का सर्जन होता है। इस शब्द का प्रयोग सामाजिक और श्रृंगारिक/शृंगारिक क्षेत्रों में किया जाता है। यही प्यार ‘प्रीति’ भी है, जिसमें ‘अनुराग’ और ‘स्नेह’ के तत्त्वों का सम्मिश्रण है। परिभाषा की दृष्टि से कहा जायेगा : किसी के मन-मस्तिष्क में उठनेवाला वह सात्त्विक भाव, जो बरबस किसी दूसरे के प्रति उत्पन्न हो और उसके प्रति ममत्व की भावना जाग्रत करता हो, ‘प्रीति’ है।

मोह-व्यामोह :–

‘मोह’ संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। ‘मुह्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के संयोग से ‘मोह’ शब्द की उत्पत्ति होती है। ‘मुह्’ धातु का अर्थ, ‘मुग्ध होना’ है।
वस्तुत: ‘मोह’ मन की वह दशा है, जिसमें मनुष्य भ्रम के कारण ‘सत्य’ को समझ पाने में असमर्थ रह जाता है। मनुष्य की ऐसी स्थिति इसलिए हो जाती है क्योंकि अनुराग की अधिकता के कारण उसकी बुद्धि पर ‘ममत्व’ का आवरण पड़ जाता है।
‘व्यामोह’ संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। इसकी उत्पत्ति इस प्रकार है। मोह की भाँति यह भी ‘मुह्’ धातु से बना है। अन्तर यह है कि इसमें ‘वि’ और ‘आ’ उपसर्ग है और ‘घञ्’ प्रत्यय प्रयुक्त है। मन की वह स्थिति है, जिसके आकर्षण में पड़कर मनुष्य दिग्भ्रमित हो जाता है और भटकाव की राह पर आ जाता है; परिणामस्वरूप वह स्वयं को कर्त्तव्य-मार्ग पर विचलन की स्थिति में पाता है। यहाँ कुछ प्रभाव ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़ता’ की भी लक्षित होती है। इसे ऐसे भी समझें : वह मानसिक अवस्था, जिसमें विकलता के कारण मनुष्य अपना कर्त्तव्य-निर्धारण करने में स्वयं को असहाय पाता है, ‘व्यामोह’ की कोटि में आती है।

स्नेह :—

यह संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। ‘स्निह्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के संयोग से ‘स्नेह’ शब्द की सृष्टि होती है। स्नेह शुद्ध सात्त्विक प्रेम का एक अभिन्न रूप है। स्नेह के अन्तर्गत वात्सल्य-भावना का प्राधान्य रहता है। कनिष्ठ का वरिष्ठ के प्रति सहज प्रेम ‘स्नेह’ कहलाता है।

प्रणय :—

यह संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। इसमें ‘प्र’ उपसर्ग है। यह शब्द ‘नी’ धातु में ‘अच्’ प्रत्यय के योग से उत्पन्न हुआ है। ‘नी’ धातु का अर्थ है, ‘पहुँचना’। यह शुद्ध शृंगारिक विषय का शब्द है। इसमें प्रेम के उदात्त, दृढ़ तथा पुष्ट रूप का प्रकीर्णन (प्रसार) होता है। यह नारी-पुरुष के उस प्रेम का सूचक है, जो अनुराग और स्नेह के मार्गों से सुदूर बढ़ता हुआ होता है।

सद्भाव :—

यह संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। यहाँ ‘सद्’ विशेषण है। सद् ‘सत्’ का एक रूप है। वह रूप ऐसा है, जो उसे कतिपय विशिष्ट दशा में यौगिक पद के आरम्भ में प्रयुक्त करने से प्राप्त होता है। ‘भाव’ ‘भू’ धातु में ‘णिच्’ और ‘अच्’ प्रत्ययों के संयोग से उत्पन्न होता है। ‘भू’ धातु का अर्थ ‘होना’ है। किसी वस्तु के अस्तित्व में बने रहने की स्थिति को ‘भाव’ कहते हैं। इस प्रकार सद्भाव एक प्रकार का सकारात्मक और सात्त्विक गुण है, जिसमें मानसिक धरातल पर शुभ्र और शुभ भाव होता है। यहाँ मन ईर्ष्या, द्वेष, मात्सर्य आदिक विकारों से रहित होता है। सहज शब्दों में :– किसी मनुष्य के प्रति मन-मस्तिष्क में अच्छे भाव अथवा विचार को धारण करना ‘सद्भाव’ कहलाता है।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २ मार्च, २०१८ ईसवी
यायावर भाषक-संख्या : ९९१९०२३८७०