आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के मार्गदर्शन मे
एक लिपिकीय परीक्षा से लेकर प्रशासनिक सेवा-परीक्षाओं मे पिछले कुछ दशकों से अनिवार्य और ऐच्छिक विषयों के प्रश्नपत्रों में जिस तरह के और जिस तरह से प्रश्नों के उल्लेख रहते हैं, उनसे यही लगता है कि उन सभी परीक्षाओं को आयोजित करानेवाले भरती (‘भर्ती’ अशुद्ध शब्द है।) बोर्ड, चयन परिषद्, आयोग आदिक के सम्बन्धित अधिकारी या तो अयोग्य और कुपात्र हैं या फिर प्रश्नपत्र की गुणवत्ता की ओर उनकी दृष्टि नहीं रहती; दूसरी ओर, शासन-स्तर पर उस ओर उदासीनता ही दिखती है। इन्हीं सबका कुप्रभाव हमारे विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क पर ऐसा पड़ता जा रहा है कि अधिकतर विद्यार्थी बौद्धिक स्तर पर कुन्द पड़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, आपत्तिजनक परीक्षानीति/परीक्षा-नीति/परीक्षा की नीति के कारण उनका भविष्य धुँधला दिखने लगा है। वास्तविकता तो यह है कि यदि कोई दूसरा प्राश्निक (प्रश्न लिखनेवाला/प्रश्न करनेवाला) उन्हीं प्रश्नो को अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रश्नपत्र लिखनेवालों/तैयार करनेवालों के सामने उत्तर लिखने के लिए प्रस्तुत कर दे तो “खटिया खड़ी-बिस्तरा गोल” कहावत चरितार्थ होती हुई दिखे। ऐसा इसलिए कि उनमे से अधिकतर प्राश्निक-परीक्षक उन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापक होते हैं, जिनमे नियुक्तियों का आधार उत्कोच (रिश्वत), पहुँच, पहुँच+उत्कोच ही है। ऐसे लोग मे यदि योग्यता हो तो हम ‘ललकार’ के स्वर मे कहते हैं, उनमे से कोई भी ‘ककहरा’ ही सुना दे। इसी के साथ कुपात्रों की एक टोली ऐसी भी है, जो पूरी तरह से सेवानिवृत्त हो चुके हैं; परन्तु वे सभी “मुह मारना” मुहावरा को जीवन्त करते आ रहे हैं। ऐसे लोग उपर्युक्त शिक्षण-संस्थानो के साथ ‘मानदेय’ के आधार पर जुड़े हुए हैं और आयोगादिक मे प्राश्निक और परीक्षक बनकर अपने अज्ञान और अपनी बुद्धिहीनता का परिचय देते हुए, हमारे विद्यार्थियों के भविष्य के साथ क्रूर उपहास करते आ रहे हैं। वे अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर प्रश्नपत्र नहीं बनाते, बल्कि दो-चार पुस्तकें लेकर कुछ इसमे से तो कुछ उसमे से प्रश्न और उत्तर-विकल्प चुरा लेते हैं और मरे हुए गीदड़ के शरीर पर ‘शेर’ के शरीर का ‘लैमिनेशन’ कराके ‘नील शृगाल’ की तरह से अपनी-अपनी ‘चतुर’ भूमिका मे दिखते रहते हैं।
हमने अपने विद्यार्थियों के हित मे पिछले कई दशकों से ऐसे अयोग्य प्राश्निकों और परीक्षकों के विरुद्ध एक अभियान भी आरम्भ किया है। इधर जैसे ही कोई प्रतियोगितात्मक परीक्षा आयोजित की जाती है, उसमे अवैध, अशुद्ध तथा अनुपयुक्त प्रश्न दिखते ही हम उनका वैध, शुद्ध तथा उपयुक्त प्रयोग सार्वजनिक कर देते हैं। आश्चर्य तब और होता है जब एक ही प्रश्न के लिए दिये गये चार उत्तर-विकल्प (‘विकल्पों’ अशुद्ध शब्द है; क्योंकि वह एकवचन और बहुवचन का शब्द है।) मे से अनेक विकल्प शुद्ध और उपयुक्त उत्तर के रूप मे दिखते हैं। प्रश्नात्मक वाक्य-विन्यास का बोध यदि ऊँची उपाधियों से युक्त कथित अध्यापकों मे न हो तो उनकी उपाधियाँ सन्दिग्ध लगेंगी ही। अध्यापक-अध्यापिकाओं की अयोग्यता के कारण प्राय: प्रत्येक प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं मे हमारे विद्यार्थियों को साक्ष्यसहित अपनी आपत्ति अंकित करानी पड़ रही है। उसके बाद भी जब उनकी आपत्ति की अनदेखी की जाती है तब वे न्यायालय की शरण मे आते (यहाँ ‘जाते’ अशुद्ध है।) हैं, जहाँ उन्हें कभी न्याय मिल पाता है तो कभी नहीं। इस प्रकार न्याय पाने की आस मे उनकी स्वर्णावस्था (यौवन) उनसे पीछे छूटती जाती है।
ऐसी स्थिति मे, हमारे विद्यार्थियों को अपना महत्त्वपूर्ण समय नष्ट नहीं करना होगा, बल्कि उसी स्तर के किसी अन्य परीक्षा मे सफलता अर्जित करने के लिए तत्काल अध्यवसाय मे जुट जाना होगा। पहले के अपने सभी असंतोष और आक्रोश को एक ‘ठान’ लेने की प्रवृत्ति के रूप मे ढाल लेना होगा, जो एक ऊर्जा के रूप मे आप सभी के शक्ति, सामर्थ्य तथा कौशल को धार देती रहे और आप अपने लक्ष्य-संधान की दिशा मे बढ़ते रहें
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विचारणीय प्रमुख तथ्य
● अर्हता-प्राप्त अनुभवी विषय-विशेषज्ञों को ही प्रश्नपत्र बनाने का दायित्व सौंपना होगा।
● सेवानिवृत्त और मठाधीशी करनेवाली अध्यापक-अध्यापिकाओं को आयोगादिक से दूर रखना होगा।
● एक ही विषय के जितने भी प्रकार के प्रश्नपत्र तैयार कराये जायें, उन्हें विषय-विशेषज्ञों के एक मानक मण्डल के मध्य प्रस्तुत कर, एक-एक प्रश्न और उसके उत्तर-विकल्प पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा।
● हमारे विद्यार्थी विपरीत स्थिति मे समस्तरीय परीक्षाओं मे विजयश्री अर्जित करने के लिए प्राणपण (‘प्राणप्रण’ अशुद्ध है।) से सन्नद्ध हो जायें।
● प्रत्येक विषय के प्रश्नपत्र की भाषाशैली की शुद्धता बनाये रखने की दृष्टि से भाषा और व्याकरण को सम्यक् समझनेवाले पण्डित-मण्डल को मानपूर्वक स्थान देना होगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ फ़रवरी, २०२२ ईसवी।
यायावर-भाषकसंख्या– ९९१९०२३८७०
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