हिन्दीभाषा का ‘स्वतन्त्र’ व्याकरणलेखन अपरिहार्य

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

हमारे हिन्दीशब्दकोशकारगण ने हिन्दीशब्दकोश के नाम पर ‘कबाड़ख़ाना’ बनाया है। इसका मुख्य कारण है कि उन्होंने उद्देश्यपरक कोश तैयार नहीं किये हैं। उद्देश्यपरक का प्रश्न इसलिए कि कौन-सा शब्द देशज/देसज है; तद्भव है; अर्द्ध तद्भव है; तत्सम है; अभारतीय है आदिक का स्पष्ट संकेत करते हुए, शब्द-अर्थ का विधान नहीं किया है। इसका मुख्य कारण है कि हिन्दी के वैयाकरण स्वतन्त्र रूप में ‘हिन्दी-व्याकरण’ आज तक नहीं लिख पाये हैं। इस असफलता में ‘मैं’ स्वयं को भी सम्मिलित करता हूँ।

हिन्दी का स्वतन्त्र व्याकरण इसलिए नहीं लिखा जा सका है कि लगभग ९५ प्रतिशत व्याकरणिक अंगोपांग ‘संस्कृत-व्याकरण’ से प्रभावित हैं। व्याकरण के प्रमुख अंग : विकारी-अविकारी शब्द, कारक, प्रत्यय, उपसर्ग, सन्धि, समास आदिक का अनुशासन ‘संस्कृत-व्याकरण’ के साथ बँधा है।

आश्चर्य तो यह है कि शब्दों के मानकीकरण करनेवालों में ही एकमत नहीं दिखता। ऐसा इसलिए कि मानकीकरण का आधार क्या है, सुस्पष्ट नहीं है और मतभिन्नता है। यही कारण है कि मौखिक (उच्चारण) और लिखित भाषाओं (लेखन) के स्तर पर बहुत अशुद्धियाँ देखी जा रही हैं।

हमारे कोशकारगण ने बड़ी संख्या में ऐसे शब्दों को ग्रहण कर लिया है, जो व्याकरण की दृष्टि से उपयुक्त नहीं हैं। कोशकार अज्ञान से ‘अज्ञानता’ को स्वीकार करते हैं; परन्तु ज्ञान से ‘ज्ञानता’ को स्वीकार नहीं कर पाते; वैसे ही महान से महानता, महानतम नहीं होता, अपितु क्रमश: महत्ता और महत्तम होता है; उसी से महत्-महत्तर-महत्तम की अवस्था संचालित होती है। सम्भ्रान्त का अर्थ ‘जो सम्यक् रूप में भ्रमित हो; कुलीन का अर्थ है, जो ‘बुराई में लीन हो’। ‘कुलीन’ के लिए संस्कृत-व्याकरण अपना तर्क उपस्थित करता है, “कुले प्रशस्तवंशे जात:”। ऐसे सहस्रों शब्द हैं, जिनके औचित्य-अनौचित्य पर विधिसम्मत समीक्षण-परीक्षण करने की अब महती आवश्यकता है। जब तक शब्दशास्त्र पर संवाद-प्रतिसंवाद, प्रश्न-प्रतिप्रश्न नहीं किये जायेंगे तथा सप्रमाण उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं दिये जायेंगे तब तक हम-आप-जैसे सहस्रों जागरूक और ज्ञानपिपासु विद्यार्थी कोश तक ही सीमित होकर रह जायेंगे। ऐसा इसलिए भी है कि हिन्दीभाषा का स्वतन्त्र व्याकरण आज तक लिखा नहीं जा सका है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ नवम्बर, २०१९ ई०)