रंग-विरंगा-रंग-बिरंगा/ रंगविरंगा-रंगबिरंगा
यहाँ पर दो शब्द हैं, जो मिलकर ‘विशेषण’ नामक शब्दभेद का बोध कराते हैं। प्रायः प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक मनुष्य-द्वारा ‘रंग-बिरंगा’ शब्द का लेखन और उच्चारण किया जाता है और अधिकतर पुस्तकों में भी यही वर्तनी दिखती है, जो कि पूर्णतः अशुद्ध है।
शुद्ध शब्द है, ‘रंग-विरंगा’। अब यही शब्द क्यों शुद्ध है? आइए! इसको समझें :—–
‘रंग’ शब्द का अर्थ आप जानते ही हैं। यह एक संज्ञा-शब्द है।इसे ‘वर्ण’ भी कहा जाता है। यह एक स्वतन्त्र शब्द है। आँखों-द्वारा प्राप्त वस्तुओं का एक गुण ‘रंग’ है। इस शब्द के साथ ‘विरंगा’ भी जुड़ा हुआ है। ‘विरंगा’ शब्द में ‘वि’ उपसर्ग है, जिसका यहाँ अर्थ है, ‘विविध’। ‘विविध’ शब्द का ‘रंग’ के साथ आने का अर्थ है, ‘रंगों की विविधता’ | अँगरेज़ी में इसे ‘multi-coloured’ कहते हैं। ‘लाल’ कहने पर एक ही रंग का बोध होता है किन्तु जैसे ही लाल, पीला, हरा, नीला, काला आदिक रंगों का उल्लेख होता है वैसे ही वे सारे रंग विविध रंगों की श्रेणी के अन्तर्गत रेखांकित होने लगते हैं।
अब हम ‘बिरंगा’ पर भी दृष्टिपात कर लें। ‘बि’ कोई उपसर्ग नहीं है। ‘बिरंगा’ से हमें कोई भी अर्थ प्राप्त नहीं हो पाता। इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि ‘बिरंगा’ कोई सार्थक शब्द नहीं है।
‘रंग-विरंगा’ के मध्य (-) चिह्न लगा है, जो एक प्रकार के समास का चिह्न है, जिसमें ‘और’ का भाव निहित है। यह ‘द्वन्द्व समास’ का चिह्न है।
इन शब्दों को मिलाकर इस प्रकार से भी प्रयोग किया जा सकता है– ‘रंगविरंगा’। इस समय यह ‘समास’ की स्थिति में है और जैसे ही हम इसे ‘रंग-विरंगा’ के रूप में प्रयोग करते हैं, यह ‘विग्रह’ का रूप प्राप्त कर लेता है; अर्थात् दोनों शब्द पृथक्-पृथक् रूप में सामने आते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २४ फरवरी, २०१८ ईसवी)