डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
शीत ऋतु का प्रारम्भ था। प्रातःकाल की धूप अभी कोमल थी और हवा में हल्की ठंडक थी। निरंजन अपने घर के बाहर बैठा था। सामने आँगन में तुलसी के चौरे पर दीपक की लौ धीमे-धीमे बुझने की ओर थी।
रात का ध्यान अभी समाप्त हुआ था, पर उसके मन में एक अजीब-सी गंभीरता थी। पिछले दिनों आचार्य के साथ हुए संवाद उसके भीतर लगातार गूँज रहे थे—
“धर्म सम्बन्धों को प्रगाढ़ करता है; सम्बन्ध धर्म का आधार नहीं हैं।”
उसी समय घर के भीतर से ऊँची आवाज़ें सुनाई दीं। निरंजन का छोटा भाई, वासुदेव, क्रोध में किसी से वाद-विवाद कर रहा था।
निरंजन भीतर पहुँचा तो देखा कि गाँव का एक वृद्ध किसान खड़ा है। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएँ थीं।
वासुदेव कह रहा था—
“मैंने जो भूमि खरीदी है वह अब मेरी है। कागज़ मेरे पास हैं। अब आप बार-बार यहाँ क्यों आते हैं?”
वृद्ध ने थरथराते स्वर में कहा—
“बेटा, कागज़ तुम्हारे पास हैं, पर वह भूमि मेरे पुरखों की है। परिस्थितियों के कारण मुझे उसे गिरवी रखना पड़ा था। मैं उसे वापस लेने आया हूँ।”
निरंजन ने शांत स्वर में पूछा—
“भाई, यह मामला क्या है?”
वासुदेव ने कुछ झुंझलाकर उत्तर दिया—
“कुछ नहीं। इन्होंने अपनी जमीन गिरवी रखी थी और समय पर पैसा नहीं दे पाए। अब जमीन हमारी हो गई है।”
वृद्ध ने बीच में कहा—
“मैंने समय माँगा था। पर इन्होंने तुरंत कागज़ बनवा लिए।”
निरंजन ने धीरे-धीरे पूरी बात समझी। क़ानून के अनुसार जमीन वासुदेव के पास थी, परंतु परिस्थिति स्पष्ट थी—यह एक अवसर का लाभ उठाकर किया गया सौदा था।
कुछ क्षण मौन रहा। फिर निरंजन ने अपने भाई से पूछा—
“क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि यह न्याय है?”
वासुदेव का स्वर तीखा हो गया—
“भैया, संसार इसी तरह चलता है। यदि हम अवसर का लाभ नहीं उठाएँगे, तो लोग हमें मूर्ख समझेंगे।”
निरंजन ने शांत स्वर में कहा—
“संसार चाहे जिस प्रकार चलता हो, पर हमें यह देखना होगा कि हमारा जीवन किस सिद्धांत पर चलता है—धर्म पर या केवल लाभ पर।”
वासुदेव ने तिरस्कार से कहा—
“तो क्या आप चाहते हैं कि मैं अपनी खरीदी हुई जमीन वापस कर दूँ?”
निरंजन ने सीधे उत्तर नहीं दिया। उसने केवल इतना कहा—
“मैं चाहता हूँ कि तुम स्वयं अपने भीतर से यह निर्णय लो कि न्याय क्या है।”
उस शाम घर में वातावरण भारी था। परिवार के कुछ लोग वासुदेव का समर्थन कर रहे थे।
एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार ने कहा—
“निरंजन, तुम बहुत आदर्शवादी बातें करते हो। परन्तु जीवन केवल आदर्शों से नहीं चलता। यदि वासुदेव ने क़ानून के अनुसार जमीन ली है, तो उसमें क्या गलत है?”
निरंजन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“क़ानून और धर्म एक ही बात नहीं होते। क़ानून समाज की व्यवस्था के लिए होता है; धर्म आत्मा की शुद्धता के लिए।”
एक और व्यक्ति बोला—
“परन्तु यदि हर कोई केवल धर्म की बात करेगा, तो संसार में व्यवहार कैसे चलेगा?”
निरंजन मुस्कुराया—
“संसार का व्यवहार तभी तक चलता है जब तक धर्म उसकी नींव में है। जब धर्म हट जाता है, तब केवल संघर्ष बचता है।”
रात को जब सब शांत हो गया, अनामिका ने धीरे से पूछा—
“तुम्हें क्या लगता है, वासुदेव तुम्हारी बात मानेगा?”
निरंजन ने कुछ क्षण सोचा।
“शायद नहीं।”
“तो फिर तुमने इतना आग्रह क्यों किया?” अनामिका ने पूछा।
निरंजन ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि यह केवल जमीन का प्रश्न नहीं है। यह हमारे जीवन के आधार का प्रश्न है। यदि हम अपने लाभ के लिए किसी की विवशता का उपयोग करें, तो वह धन हमें भीतर से कमजोर बना देगा।”
अनामिका ने गंभीर स्वर में कहा—
“परन्तु यदि तुम्हारे कारण तुम्हारे अपने ही लोग तुमसे दूर हो जाएँ तो?”
निरंजन कुछ देर मौन रहा। फिर बोला—
“यदि धर्म के कारण कोई सम्बन्ध टूटता है, तो वह वास्तव में पहले से ही कमजोर था। सच्चे सम्बन्ध धर्म के कारण टूटते नहीं, बल्कि और गहरे हो जाते हैं।”
उस रात निरंजन देर तक जागता रहा। उसके भीतर एक गहरी अनुभूति उठ रही थी—यह केवल पारिवारिक विवाद नहीं है।
उसे लगा जैसे जीवन स्वयं उसकी परीक्षा ले रहा है।
उसे अचानक आचार्य की बात याद आई—
“अगली परीक्षा तुम्हारे विश्वास की नहीं, तुम्हारे प्रेम की होगी।”
अब वह समझ रहा था कि इसका अर्थ क्या था।
धर्म की रक्षा करना तब सरल होता है जब विरोधी कोई अजनबी हो।
परन्तु जब वही संघर्ष अपने ही प्रियजनों के बीच खड़ा हो जाए, तब साधना की वास्तविक परीक्षा आरम्भ होती है।
अगले दिन सुबह वासुदेव अचानक निरंजन के पास आया। उसके चेहरे पर रात भर की बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“भैया… क्या आपको सचमुच लगता है कि मैं गलत हूँ?”
निरंजन ने उसे ध्यान से देखा।
“मैं तुम्हें गलत या सही नहीं कह रहा। मैं केवल इतना पूछ रहा हूँ कि तुम्हारा मन तुम्हें क्या कह रहा है।”
वासुदेव कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“सच कहूँ तो… मन में शांति नहीं है।”
निरंजन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“यही तुम्हारे भीतर का धर्म है। जब मन शांत न रहे, तो समझ लो कि कहीं न कहीं संतुलन टूट गया है।”
वासुदेव ने धीरे से कहा—
“यदि मैं जमीन लौटा दूँ, तो लोग मुझे मूर्ख समझेंगे।”
निरंजन मुस्कुराया—
“धर्म के मार्ग पर चलने वाले को संसार अक्सर मूर्ख समझता है। परन्तु वही मूर्खता अंततः मनुष्य को भीतर से शक्तिशाली बनाती है।”
उस दिन वासुदेव ने वह भूमि वापस कर दी।
वृद्ध किसान की आँखों में आँसू थे। उसने निरंजन के चरणों को छूने की कोशिश की, पर निरंजन ने उसे रोक दिया।
“यह मेरा निर्णय नहीं था,” उसने कहा। “यह तुम्हारे और वासुदेव के बीच धर्म का निर्णय था।”
जब सब लोग चले गए, निरंजन आँगन में अकेला बैठा रहा।
उसके भीतर एक अद्भुत शांति थी—परन्तु साथ ही एक नया बोध भी।
उसे लगा कि साधना केवल ध्यान में नहीं होती।
वह जीवन के हर निर्णय में होती है।
और शायद यही कारण था कि आचार्य की परीक्षण प्रणाली इतनी सूक्ष्म थी—
क्योंकि वहाँ परीक्षा प्रश्नों से नहीं, परिस्थितियों से ली जाती थी।