राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’
हिंसक पशु कब समझा है,
कोमल मन के भाव मधुर ।
बिना दण्ड कब सुधरे हैं,
वामी, कामी और दुष्ट असुर ।
इस समाज की नीवँ धर्म है,
यह हर प्राणी को याद रहे ।
मानवता ही धर्म अचल है,
हर किसी को इसका ज्ञान रहे ।
सर्वधर्म समभाव जहाँ है,
वहीं नियति सुख लाती है ।
एकोऽहम द्वितीयोनास्ति
यह मंशा वैर बढ़ाती है ।
धर्म सनातन सूत्र शान्ति का,
जितना शीघ्र सभी समझेंगे ।
इस समाज में ख़ुशियों के दिन,
उतनी ही जल्दी लौटेंगे ।।
(रचना-तिथि – ०८|०१|२०२०, स्थान – बालामऊ, हरदोई)