अंधकार संग मैं निरा अकेला, मुझको याद प्रिये की आयी

असित दुबे, हरदोई-

इस शीतल सी निशा घड़ी में,
चपल चंद्रिका चाँद को लाई,
अंधकार संग मैं, निरा अकेला,
मुझको याद प्रिये की आई।

यह चुभती सी विछोह वेदना,
है घुली हुई मेरे प्रतिपल में,
मेरे मुंदे हुए नम नयनों से,
गिरते तिरते खारे जल में।

ये जो तेरे सुरभि स्मरण,
बीते क्षण तेरे आँचल में,
चाहे जितना इनको भूलूँ,
घिरता जाता विरहानल में।

इस बयार की क्रीड़ाओं में,
संकुची जाती है ये व्यथा,
नभ निहारता देख रहा हूँ,
चन्द्र -चंद्रिका की वस्ल कथा।