जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद)
तीरगी का कह्र नित बढ़ा जा रहा है।
रोज़ जुम्ला नया इक गढा जा रहा है।।
माना हलचल नहीं है शहर में तिरे;
दूर कोई बवण्डर चला जा रहा है।
नाम बदलना ही है ,बदल दो भूख का;
कोई भूखा,कोई खा-खा मरा जा रहा है।
विकास नाम कैसे पड़ा, ये बता तो ज़रा;
हर किसी को इसी से छला जा रहा है।
नाम बदलो रुपैया का फ़िर से कोई;
रोज़ डॉलर जो उस पे चढ़ा जा रहा है।
तोड़ कर स्वप्न ,करने जो साकार थे;
फ़ातिहा कब्र पे क्यों पढ़ा जा रहा है।