मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ-
ज़रा सोचो अधूरे ख़्वाब सजाने कौन आएगा |
अगर रूठी तो अब तुमको मनाने कौन आएगा ||
सोचा मिलता चलूँ तुमसे कहीं मैं जा रहा था और |
बहाने कर तुम्हारा साथ निभाने कौन आएगा ||
ये सोचा नहीं तुमने मेरा दिल तोड़ने के बाद |
तुम्हारे नाज़ शिद्दत से उठाने कौन आएगा ||
तुम अपना नाम जो सुनकर ज़माना भूल जाती थी |
तुम्हें अब ‘जान’ कह कहकर बुलाने कौन आएगा ||
कभी बेचैन होगी तुम नहीं आँखों में होगी नींद |
कौन बहलाएगा तुमको सुलाने कौन आएगा ||
आइना झूठ कह देगा तुम्हें बे’ज़ार करने को |
तुम्हें आँखों का आईना दिखाने कौन आएगा ||
कोई जब दिल दुखाएगा बहुत मजबूर होगी तुम |
मुहब्बत तुम से ही है बस जताने कौन आएगा ||
कदम बढ़ने लगेंगे ग़र कभी पुरख़ार राहों पर |
तुम्हें राह-ए-गुलिस्ताँ फिर बताने कौन आएगा ||
बहुत मासूम हो तुम ‘जान’ तुम्हें ये भी नहीं है इल्म |
कोई बहकाएगा तुमको बचाने कौन आएगा ||
हसीं सावन जो आएगा बहारें दिल जलाएंगी |
तुम्हें बाहों में अपनी तब झुलाने कौन आएगा ||
बहुत थक जाओगी और टूटकर सो जाओगी जब तुम |
सुबह चूमेगा तुमको कौन जगाने कौन आएगा ||
कहीं ‘मन’ टूट न जाना बहुत भोली है तेरी जान |
वो उलझेगी ये है तय तो सुलझाने कौन आएगा ||