अस्तित्व नहीं खोना मुझे

ज़ैतून ज़िया (अध्यापिका)-

मन करता है तुम्हें बाँध लूँ कविता में
सब पढ़े तुम्हें
पसंद करें तुम्हें
बार बार दोहराये तुम्हारी पंक्तियों को प्रेम में
लेकिन फिर भी तुम मेरे ही रहो 
बिलकुल मेरी कविता जैसे

तुम्हें जब भी लिखा जाये
तुम्हारा नाम शीर्षक में
और मै सबसे नीचे कोने में
सबसे नीचे कोने में इसलिए
की तुम्हें पढ़ा नहीं जिया है मैंने
ऊपर से नीचे तक उतर के आई हूँ मै
तब पहुंची हूँ इस जगह
और अब यहीं रहना है मुझे
जैसे पहाड़ से नदी उतरकर
उसके पैरों को पखारती है
बस हाँ बिलकुल वैसे ही

लेकिन नहीं जाना मुझे समुद्र में
अस्तित्व खोना नहीं मुझे
मुझे सड़ जाना है यहीं पे तुम्हारे पास
लेकिन अस्तित्व खोना नहीं मुझे
उस विशाल समुद्र में मिल के
जिससे मिलती है बहुतेरी नदियाँ रोज़
और वो जानता भी नहीं उन्हें
याद भी नहीं रखता उन्हें

तुमने ये भी नहीं पूछा
की किस-किस  पहाड़ से बह के आई हूँ मै
किस किस का अंश लिए हूँ अपने भीतर
उसे तो मतलब था बस की उसकी हुई हूँ
अंत में ही सही
उस से गुज़री हूँ
उसके अंश ले के
बिलकुल अलग पहाड़ था वो

कहीं छोटी सी पंक्ति थे तुम
तो कहीं बस एक कठोर शब्द
कहीं मर्यादायें तोड़ी थी तुमने
तो कहीं प्रेम से बांध लिया था
कहीं गुन गुनाये तो कहीं चुभे हो
लेकिन तुम बिलकुल वैसे नहीं
कहीं टुकड़ा टुकड़ा हो के
मुझमे मिल गए हो
जैसे शब्द मिलते है कविता में
जैसी होती है कविता
या जैसा होनी  चाहिए थी
तुम नहीं थे वैसे 
तुम कविता हो के भी बहुत अलग थे
शायद तभी मुझे रुकना ज़रूरी हो गया !!!