नरेन्द्र मोदी! कब तक आप देशवासियों के साथ छल करते रहेंगे?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


संयुक्त अरब अमीरात में भारत की आन्तरिक राजनीतिक गतिविधियों पर नकारात्मक विचार व्यक्त करते समय आपको लज्जा नहीं आयी? वहीं जब आपके पगचिह्नों पर चलते हुए, विपक्षी नेता राहुल गांधी और अन्य नेतागण विदेशी धरती पर भारत की आपत्तिजनक राजनीतिक वैमनस्य का उद्घाटन करते हैं तब आप और आपके सिपहसालार अमित शाह, रविशंकर प्रसाद आदिक तिलमिला उठते हैं। मत भूलिए, आपने अपनी बुद्धि-चातुर्य का कुपरिचय देते हुए, सम्पूर्ण देश में जिस प्रकार का विषाक्त वातावरण बना दिया है, उसका दंश तो आप और आपके सिपहसालारों को झेलना ही पड़ेगा और देश को साम्प्रदायिकता की आग के हवाले करने का परिणाम और प्रभाव को भी भुगतना होगा।
वहाँ आपने क्यों नहीं बताया : बीते लोकसभा के चुनाव के दौरान ५६ इंच का सीना लहराते हुए, नरेन्द्र मोदी खोखली गर्जना करता रहा कि यदि उसकी सरकार बना दोगे तो वह पाकिस्तान जाकर एक के बदले ग्यारह सिर काटकर लायेगा, परन्तु मेरे भाइयो-बहनो-मितरो! वह तो मेरी ‘जुमलेबाज़ी’ थी। यही कारण है कि मेरे शासनकाल में अब तक हज़ारों सैनिक मारे जा चुके हैं और मैं नकारा बना रहा हूँ। आयेदिन हमारे देश के सैनिक मेरी सरकार की स्वार्थपूर्ण राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के चलते, पाकिस्तानी आतंकियों और सैनिकों के द्वारा मारे जा रहे हैं परन्तु मैं ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ बना ‘वर्ल्ड लीडर’ के भार को एक ‘जीवित शव’ के रूप में ढोता आ रहा हूँ। उदाहरण के लिए : १० फरवरी, २०१८ ई० को पाकिस्तानियों-द्वारा ५ भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी गयी थी और मैं अपना देश छोड़कर विदेशों में घूम रहा हूँ। वहाँ के सैनिकों के बच्चे मुझसे पूछ रहे हैं; मृतक सैनिकों की पत्नियाँ पूछ रही हैं : बता मोदी! तेरे इरादे और वादे कहाँ चले गये? तू और कितने सैनिकों की हत्या करायेगा? शासन सँभालने में समर्थ नहीं है तो गद्दी छोड़। मेरा मन विदेशों में रमने लगा है, स्वदेश की राजनीति तो एक आड़ है।
नरेन्द्र मोदी मृतक के स्वजन के प्रश्नों के उत्तर देने में पूरी तरह से नाकाम हो चुके हैं, कदाचित् इसीलिए भागे-भागे फिर रहे हैं। विकास और उपलब्धियों के नाम पर यदि कुछ किया होता तब तो उनकी सच्ची तस्वीर सामने आती? विपक्षियों, विशेषत: काँग्रेस के सत्तर वर्ष के कार्यकाल को काला इतिहास बताते हुए, अपने मूल कर्त्तव्य की इतिश्री करते दिखते हैं। देश की जनता भी “जायें तो जायें कहाँ” की स्थिति में स्वयं को पा रही है।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ११ फ़रवरी, २०१८ ई०)