डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
वाह! क्या मैच था! पचासवें ओवर की आख़िरी गेंद फेंके जाने से पहले तक कौन हारेगा और कौन जीतेगा, इसकी घोषणा करने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं थी। पहले तो यह लग रहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच फाइनल होगा; क्योंकि फाइनल में पहुँचने के लिए जब पाकिस्तान-बाँग्लादेश का मैच हो रहा था तब काग़ज़ पर पाकिस्तानी दल बीस नज़र आ रहा था; परन्तु बाँग्लादेश के शेरों ने पाकिस्तान को जिस तरह से धूल चटायी थी, वह देखते ही बनता था।
इस तरह से दुबई में दिन-रात के मैच के रूप में भारत-बाँग्लादेश के बीच क्रिकेट एशिया कप का फाइनल मैच खेला गया था। भारत ने टॉस जीतकर पहले क्षेत्ररक्षण करने का निर्णय किया था।
बाँग्लादेश के खिलाड़ियों ने बल्लेबाज़ी करते हुए, पहले विकेट की कीर्तिमान साझेदारी में १२० रन बने थे। लिटन दास ने शानदार शतक (१२१ रन) बनाया था। पहले विकेट के गिरने के बाद शेष विकेट एक छोटे अन्तराल पर गिरते गये थे। अन्त में ४८.३ ओवरों में बाँग्लादेश ने १० विकेटों पर २२२ रन बनाये थे, जबकि लग रहा था कि बाँग्लादेश ३०० रन के लगभग पहुँच जायेगा; परन्तु जब भारत के नियमित गेंदबाज़ विकेट लेने में नाकाम हो रहे थे तब भारत के हरफ़नमौला खिलाड़ी केदार जाधव ने २ विकेट लिये। कुलदीप यादव ने ३ विकेट लिये थे। आरम्भिक बल्लेबाज़ भारतीय गेंदबाज़ों को पानी पिलाते हुए दिखे थे। उनका जज़्बा देखते हुए बनता था। अन्तत:, बाँग्लादेश ने ४८.३ ओवरों में १० विकेटों पर २२२ रन बनाये थे, जिसके उत्तर में भारत ने अति रोमांचक मुकाबले में ५० ओवरों में ७ विकेट पर २२३ रन बनाकर ३ विकेटों से ‘एशिया कप’ जीत लिया है। भारत ने सातवीं बार यह चैम्पियनशिप जीती है, जबकि बाँग्लादेश तीसरी बार फाइनल में मुकाबला कर रहा था। यह दूसरी बार हुआ है कि एकदिवसीय फाइनल मैच में बल्लेबाज़ी करते हुए, ५० वें ओवर में जीत मिली हो। इससे पूर्व भारत-पाकिस्तान के मध्य खेले गये फाइनल में ऐसी स्थिति आयी थी।
क्षेत्ररक्षण करते हुए भारतीय खिलाड़ी चहल ने लिटन का कैच छोड़ा था, जो आगे चलकर इतना महँगा पड़ा कि भारतीय गेंदबाज़ पहले विकेट के लिए की गयी शतकीय साझेदारी के सामने घुटने पर आ गये थे। वैसे कुल मिलाकर भारत का क्षेत्ररक्षण ज़बरदस्त था। यही कारण है कि भारत के क्षेत्ररक्षकों ने ३ खिलाड़ियों को रन आऊट किये थे।
बाँग्लादेश को मात्र २२२ रनों पर ढेर कर देने बाद जब भारत की बल्लेबाज़ी सामने आयी तब लग रहा था कि भारत ४०-४५ ओवरों में जीत के लिए निर्धारित २२३ रनों के लक्ष्य को अर्जित कर लेगा; परन्तु हुआ कुछ और। बाँग्लादेश के तीव्र गेंदबाज़ों ने भारतीय बल्लेबाज़ों को एक-एक रन के लिए तरसा दिये थे। रुबल ने सधी हुई गेंदबाज़ी की थी। शिखर धवन और रोहित शर्मा के आऊट होने के बाद भारत के बल्लेबाज़ बाँग्लादेश के गेंदबाज़ों का साहस के साथ सामना नहीं कर पा रहे थे। यही कारण था कि प्रत्येक ओवर में भारतीय बल्लेबाज़ १-१ रन के लिए तरसते हुए दिख रहे थे। १० वें ओवर से ४९.५ वें ओवर तक भारतीयों और बाँग्लादेशियों की साँसें टँगी हुई थीं। केदार जाधव के घायल होने और धोनी के ग़ैर-ज़िम्मादाराना शॉट खेलकर आऊट होने के बाद भारतीय खेमे में निराशा की चादर टँगी नज़र आ रही थी; क्योंकि गेंदों और रनों की संख्या में मात्र २-१ का अन्तर था। बाँग्लादेश के कप्तान मशरफे मुर्तजा की कप्तानी देखते ही बनती थी। यही कारण था कि आख़िरी गेंद तक खेल में रोमांच बना रहा। बाँग्लादेश के खिलाड़ियों का क्षेत्ररक्षण और उनमें आशा-विश्वास का संचार देखते ही बन रहा था। भारत के बल्लेबाज़ महेन्द्र सिंह धोनी/धौनी सबसे नाकाम खिलाड़ी सिद्ध हुए हैं। ऐसा इसलिए कि धोनी ने क्षेत्ररक्षण करते समय एक आसान स्टम्प करने का मौक़ा गवाँ दिया था और जब उनकी बल्लेबाज़ी का समय आया तब १५ गेंदों में मात्र ४ रन बनाकर खेल रहे थे। वहीं धोनी यदि प्रत्येक गेंद पर १-१ रन ही बनाये रहते तो भारत ४० वें ओवर में ही जीत अर्जित कर लेता। ऐसा लग रहा था, मानो धोनी ‘टेस्ट मैच’ खेल रहे थे। क़ाइदे से धोनी से पहले केदार जाधव को भेजना चाहिए था; क्योंकि धोनी जज़्बा और तकनीकी स्तर पर अब बूढ़े हो चुके हैं और उनके अन्दर अब जूझने की सामर्थ्य नहीं दिखती। यही कारण है कि पिछले कई एकदिवसीय मैचों में से एक भी मैच में ५० रन भी नहीं बना पाये हैं। दूसरी ओर, केदार जाधव के घायल होने के तुरन्त बाद उन्हें आराम देना चाहिए था; क्योंकि एक रन लेने के लिए वे दौड़ने में असमर्थ थे। इस कारण ५-६ रन लिये ही नहीं गये। यहाँ पर कप्तान रोहित शर्मा की तात्कालिक निर्णय न कर पाने की अक्षमता सामने आयी है। क्षेत्ररक्षण के समय जब रोहित शर्मा ने ‘स्लिप’ से खिलाड़ी हटा लिये थे तब उसी क्षेत्र से होकर कई आसान कैच निकले थे। उसके बाद भी कप्तान रोहित के पल्ले कुछ पड़ नहीं रहा था। भारत के कप्तान की तुलना में बाँग्लादेश के कप्तान की रणनीति और अपने खिलाड़ियों में ऊर्जा भरने का तरीक़ा बेहतर दिखा था।
रवीन्द्र जडेजा, दिनेश कार्तिक, भुवनेश्वर कुमार तथा केदार जाधव और कुलदीप यादव की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ऐसा लग रहा था कि कहीं वह फाइनल मैच ‘टाइ’ (बराबरी) की स्थिति में न आ जाये। ४९.५ वें ओवर में भारत ने जब २२२ रनों की बराबरी कर ली थी तब भारतीय खेमे ने राहत की साँस ली थी। ‘मैन ऑव़ द टूर्नामेण्ट’ भारत के आरम्भिक बल्लेबाज़ शिखर धवन को इस टूर्नामेंट में सर्वाधिक रन बनाने के लिए दिया गया था।
यद्यपि जीत के मानकों के अनुसार भारत जीता है तथापि वास्तविक जीत भारत-बाँग्लादेश के बाईस खिलाड़ियों की हुई है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २९ सितम्बर, २०१८ ईसवी)