नवाचार के अन्तर्गत शीतांशु त्रिपाठी ने बनाया ऑटोमैटिक डस्टबिन-
रिपोर्ट: राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’–
राघौगढ़ की जेपी यूनिवर्सिटी में बीटेक के छात्र शीतांशु त्रिपाठी ने वायरलेस इंटनेट पर आधारित मैकेनिकल तकनीक से लैस खास डस्टबिन तैयार किया है। इसकी दो खासियत हैं। पहली, जैसे ही कोई कचरा डालने के लिए इसके पास पहुंचेगा तो इसका ढक्कन अपने आप खुल जाएगा। दूसरे, जैसे ही यह फुल होगा तो माेबाइल या कंप्यूटर पर मैसेज पहुंच जाएगा। साथ ही डस्टबिन में लाल बत्ती और अलार्म भी बजेगा। लाइव स्टेटस भी मिलेगी, यही नहीं इसमें भरने वाले कचरे की लाइव स्टेटस रिपोर्ट मिलती रहेगी। यानि कितने सेमी कचरा भर गया है और अब कितनी जगह और बची है। शीतांशु ने बताया कि उन्होंने इसका प्रोटोटाइप 2 हजार रुपए खर्च करके तैयार किया है। यूनिवर्सिटी द्वारा विज्ञान में नवाचार को लेकर होने वाली सालाना प्रतियोगिता के लिए तैयार किए गए उनके इस प्रोजेक्ट को पहला पुरस्कार भी मिला। उनका कहना है कि ऐसे डस्टबिन को अगर बड़े पैमाने पर तैयार किया जाए तो इस पर 100 से 125 रुपए अतिरिक्त खर्च आएगा।
कैसे काम करता है इसका सिस्टम
शीतांशु ने बताया कि इसमें दो तरह की तकनीक हैं। एक तो मैकेनिकल सिस्टम है, जो डस्टबिन के ढक्कन को खोलता है। इसके लिए एक मोटर लगती है। जो बैटरी या सोलर ऊर्जा से संचालित हो सकती है। दूसरा सिस्टम वायरलैस तकनीक पर आधारित है। इसमें वे सेंसर्स हैं जो मैकेनिकल सिस्टम को यह संदेश भेजते हैं कि कोई कचरा डालने आया है इसलिए अब ढक्कन खोला जाना चाहिए। दूसरे वाई-फाई सिस्टम है, जो कंप्यूटर या मोबाइल पर इसके भरने या कचरे की लाइव स्टेटस भेजता है।
लोग डस्टबिन का ढक्कन नहीं खोलते हैं और पास ही फेंक देते हैं कचरा
उन्होंने बताया कि लोगों की कुछ आदतों काे देखकर उन्हें इस तरह के डस्टबिन बनाने का आइडिया आया। वे बताते हैं कि कॉलेज में अक्सर वे देखते थे कि डस्टबिन में कचरा फेंकने से पहले उसका ढक्कन खोलने को लेकर ज्यादातर लोग हिचकिचाते हैं। कुछ को तो गंदगी को लेकर समस्या होती है। वहीं कुछ आलस के चलते ऐसा करते हैं। दूसरी समस्या सभी जगह है। हमारा नगरीय प्रशासन डस्टबिन तो लगा देता है लेकिन उन्हें नियमित रूप से खाली करने का सिस्टम ठीक से काम नहीं करता। इसलिए वे ओवर फ्लो होते रहते हैं। इसलिए उनके दिमाग में यह आइडिया आया कि ऐसा डस्टबिन बनाया जाए, जो भरने पर खुद ही अलर्ट भेज दे।
कोई स्पांसर मिले तो इसका और विकास किया जाए
उन्होंने कहा कि उनका प्रोटोटाइप तो तैयार है लेकिन इसे बड़े पैमाने पर बनाने के लिए किसी स्पांसर की जरूरत पड़ेगी। सरकार भी उनके इस आइडिया पर काम कर सकती है। इसमें कई और सुधार संभव हो सकते हैं। मसलन ऐसे सेंसर लगाए जाएं जो इंसान और मवेशियों के बीच फर्क कर सकें। यानि इसका ढक्कन तभी खुले जब कोई इंसान इसके पास पहुंचे।