डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
देश के समस्त मीडिया-तन्त्र में काम करनेवालों को ‘पार्थिव शरीर’ और ‘पंचतत्त्व’ की अर्थ, परिभाषा तथा अवधारणा का ज्ञान नहीं है अथवा वे समझना नहीं चाहते।
वस्तुत: प्राणी जीवित अथवा मृत अवस्था में ‘पार्थिव शरीर’ को ही धारण किये रहता है; जबकि हमारे देश के मीडियाकर्मी व्यक्ति के मृत्यु को प्राप्त कर जाने के बाद को ‘पार्थिव शरीर’ समझते और मानते आ रहे हैं। जब देश के किसी उल्लेखनीय व्यक्ति का शरीरान्त हो जाता है तब सम्बन्धित सभी संवाददाता इसी तरह की सूचना देते हैं।
‘पार्थिव’ का अर्थ है, ‘पृथ्वी से उत्पन्न’ (मिट्टी का बना हुआ), ‘माटी का तन’। सत्य यह है कि प्राणी के शरीर का जैसे ही अन्त होता है वैसे ही शरीर को सक्रिय करनेवाला सूक्ष्म पंचतत्त्व– क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर प्राणि-शरीर से मुक्त हो जाता है।
हमारे मीडियाकर्मी मनुष्य के शरीरान्त के बाद ‘अन्त्येष्टि-क्रिया’ के समय भी कहते हैं :– अमुक व्यक्ति का शरीर पंचतत्त्व में मिल गया।
इसे अविवेक का ‘अतिरेक’ ही कहा जायेगा। शरीर तो नष्ट हो जाता है। शरीर को जो शक्तियाँ ‘पंचभूत’/ ‘पंचतत्त्व’ के रूप में गतिशील करती हैं; स्फूर्ति सम्पूरित किये रहती हैं, वे देह के मरते ही उसमें से निकल कर अपने-अपने स्रोत में विलीन हो जाती हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अगस्त,२०१९ ईसवी)