देश की सरकार चलानेवालों का नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’ सचमुच एक ढकोसला सिद्ध हो रहा है?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

बौद्धिक परिसंवाद-आयोजन


संयोजक-सूत्रधार : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


यहाँ हमने ‘मुक्त मीडिया’ के उन मित्रों के विचार आमन्त्रित किये हैं, जो बौद्धिक धरातल पर उन्नत हैं।
आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है :—-
देश के नागरिकों को ईमानदार स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाएँ क्यों नहीं मिल पा रही हैं? देश का वास्तविक साक्षरता-प्रतिशत कितना है? हमारी पीढ़ी में कितनी राष्ट्रवादिता है? देश का नागरिक अपने कर्त्तव्य के प्रति कितना जागरूक है? देश की शिक्षा-प्रशिक्षा-परीक्षा-सेवा (नौकरी)-पद्धति पारदर्शी और ईमानदार क्यों नहीं बन पा रही है? देश का प्रत्येक नागरिक भ्रष्ट (मनसा-वाचा-कर्मणा) क्यों है? अपनी प्रजाओं पर शासन करनेवाले समदर्शी क्यों नहीं हैं ?
इन बिन्दुओं पर सरकार अपना ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं कर पा रही है?
जिस दिन ये सारे प्रश्न-चिह्न मिट जायेंगे, सारा देश स्वत: ‘स्मार्ट’ हो जायेगा; न ‘मेक इन इण्डिया’ का ढकोसला दिखाकर, देश की जनता के ‘करों’ का दुरुपयोग किया जायेगा और न ही ‘न्यू इण्डिया’ का तुग़लकी राग अलापा जायेगा।
आप यहाँ अपने सकारात्मक और अर्थपूर्ण विचार शालीनतापूर्वक व्यक्त कर सकते हैं।


महेन्द्र प्रकाशी- भूखी माँ के भूखे बच्चे स्कूलों को जाते हैं ।
क्या कुछ पढ़ने जाते हैं और क्या कुछ खाकर आते हैं ?
तुमको कुछ मालूम नहीं मां कैसी साज़िश चलती है,
खेल-कूद पर बच्चे अपनी उम्र चबा कर आते हैं!
नमन आदरणीय आपकी संवेदनशीलता को ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- प्रकाशी जी! उपर्युक्त कारणों का निवारण कैसे हो सकता है?

महेन्द्र प्रकाशी- आमूलचूल परिवर्तन के लिए कमर कसनी होगी श्रीमान जी!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- प्रकाशी जी! कमर कसने के अन्तर्गत आप कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनाना चाहेंगे?

देवेश पाण्डेय- एक मात्र कारण है हमारी अशिक्षा और उससे उतपन्न गरीबी |

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- इसे दूर कैसे किया जा सकता है?

रमेश मिश्र- आजादी और लोकतंत्र की स्थापना की लक्ष्य पूर्ति ही खतरे में लग रही है देश की राजनीति साम दाम दंड भेद से किसी न किसी तरह सत्ता में बने रहने तक केंद्रित हो गई है हर कदम वोट की राजनीति से प्रेरित रहता है देश और जनहित से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मिश्र जी! आप तो एक प्रतिष्ठित अभिभाषक-अधिवक्ता हैं, ऐसे में, आपको नहीं लगता, शासन-संचालकों का यह कृत्य एक प्रकार का ‘वैधानिक अपराध’ है, जिसके विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही की जा सकती है?
कृपया इस पक्ष से इस पर प्रकाश डालें।

रमेश मिश्र- पांडे जी यहां नैतिकता और ईमानदारी का सवाल है इसमें विधिक पक्ष क्या कर सकता है ज्यादा से ज्यादा चुनावी घोषणा पत्र का अनिवार्य अनुपालन मुद्दा हो सकता है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मिश्र जी! अब तो सभी दल इस होड़ में लग गये हैं कि सत्तासीन होने के लिए कौन सबसे अधिक नैतिकविहीन और बेईमान हो सकता है। ऐसे में, लोकतन्त्र की रक्षा के लिए जनसामान्य की किस प्रकार की भूमिका कारगर सिद्ध हो सकती है? ऐसा इसलिए भी कि देश की जनता धर्म, जाति, वर्गादिक में बँटी हुई है।

घनश्याम अवस्थी- सत्ता के लिए आतुर लोग जब-जब सत्तासीन हुए; अपने उदरपूर्ति से निवृत्त न हो सके। भ्रष्टाचार के कतिपय उदाहरण इसके प्रमाण हैं। सत्ताधारी प्रायः चुनाव जीतने के लोभ से ग्रसित होकर चुनाव पूर्व लोकलुभावन योजनाओं को लाते हैं। जनता और देश का दीर्घकालिक हित साधने वाली सरकारें चुनाव में पुन: सत्ता में न आ सकीं ….. अटल जी की सरकार इसका एक उदाहरण है।
लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष का न होना भी कभी अच्छा नहीं होता। शिक्षा,स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और बेरोजगारी जैसे क्षेत्र में किये गये कार्यों का प्रभाव तुरन्त दिखाई नहीं पड़ता; इसलिए इन क्षेत्रों में कार्य करने के लिए बड़ा दिल चाहिए। सियासत, कुर्सी-दौड़ का खेल नहीं।
जनता को जागरूक करना होगा। यह एक उपाय हो सकता है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अवस्थी जी! आपके विचारों में पक्वता है परन्तु हमारे प्रश्न वहीं पर ठहरे हुए हैं। आपने जन-जागरूकता की बात की है, उसे आप व्यावहारिक रूप किस तरह से देंगे?

घनश्याम अवस्थी- जन-जागरण के अनेक आयाम हो सकते हैं। यह कार्य केवल और केवल राजनीति से दूर रहने वाले नागरिकों द्वारा ही तटस्थता के साथ किया जा सकता है। समर्पित सपूतों का एक नेटवर्क बनाना होगा। जागरूकता का अभियान चलाने पर आवाम का समर्थन मिलना तय है। जैसे आदरणीय अन्ना हजारे जी को समर्थन मिला। कार्य चुनौतीपूर्ण है। राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा से बचकर रहना होगा। परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होंगे।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अत्युत्तम विचार और सुझाव है। आपका साधुवाद।

रमेश मिश्र- अवस्थी जी का सुझाव निस्संदेह बहुत उत्तम है लेकिन सुझाव केवल सुझाव तक ही न रह जाए उस पर अमल के लिए विचार किया जाना चाहिए

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जी मिश्र जी! आप अपने अनुभव को साझा करें।

प्रमोद कुमार- “सबका साथ ‘कुछ लोगों’ का विकास” के प्रति अग्रसर…

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रमोद जी! ऐसी संकुचित दृष्टि के पीछे किस प्रकार की मानसिकता काम कर रही है?

प्रमोद कुमार- श्रद्धेय ! वैमनस्यपूर्ण,स्तरहीन,राष्ट्रीय-विकास मुद्दों से इतर एक दूसरे के ‘तूँ-तूँ’-‘मैं-मैं’ ,कुकुर ‘झौं-झौं’ वाली नयी ‘राजनीतिक संस्कृति’ का अभ्युदय हो गया है,यह घातक और अधोगति को ले जाने वाला सिद्ध होगा। अब जरूरी है कि विकास के लिए शीघ्रातिशीघ्र बेरोजगार ‘युवाओं-किसानों’ को केन्द्र में रखकर योजनाओं को धरातल पर लाया जाए। यूथ अनरेस्ट ‘युवा-असंतोष’ की स्थिति न आए।

दिनेश कुमार- धन्य हैं सर आप औऱ आप की सोच ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उक्त विषय पर अपनी सुस्पष्ट टिप्पणी कीजिए।

दिनेश कुमार- गुरुवर आज के वर्तमान समय में आप जैसे बहुत कम सामाजिक विचारक है, जो जाति गत एवं रुढईवादी विचार से ऊपर उठा कर जनहित की बात को समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं।जहां तक सरकारों की बात है तो उन्हें अपने कुर्सी से परे कुछ अच्छा करने पर सोचते नहीं, लूट घसोट अपनी अपनी पड़ी हैं। लोग सच्चाई जानने के बाद भी अपनी तुच्छ अवधारणा के कारण सरकार की सरकार की बुराइयों की पर्दाफ़ाश करने के बजाय तारीफ़ की पुल बाधते हैं ,  राजनीति में चढ़क्य आदि के विचारों का कोई महत्व नहीं देते। आपने यथार्थ और सत्य बात कही है ।

जगन्नाथ शुक्ल- आदरणीय गुरुदेव को सादर निवेदित…

  • जनता एक ढांचें में ढ़ल चुकी है स्वास्थ्य के स्तर पर सब अपने सामर्थ्य के अनुसार निर्णय लेते हैं और कमोवेश शिक्षा में भी यही स्थिति है और जहाँ तक बात सरकार की है तो आधुनिक सरकारें केवल सत्ता प्राप्ति की लालसा रखती हैं और कुछ नहीं और अपनी अशिक्षा के दम पर जनता उनें यह अवसर देती है। जो समाज का शिक्षित एवं बौद्धिक वर्ग है वह केवल आईना दिखाता है उदाहरण नहीं बनता क्योंकि वह स्वयं मतदान नहीं करता।
  • राष्ट्रवादिता एक गम्भीर विषय है, घर में बैठकर पहले पेट भरा होना चाहिए, बदन में कपड़े होने चाहिए, मस्तिष्क में विचार होने चाहिए और उसके लिए ज्ञान होना चाहिए; तब जाकर कहीं राष्ट्रीयता का उद्भव होता है और आजकल उदाहरण के साथ-२ राष्ट्रवादिता का कोई सर्वमान्य चेहरा भी नहीं पैदा होता। युवा इसी समाज में रह रहा है तो समाज में जो संस्कृति और सभ्यता है उसी से वह भी सीखता है।
  • सभी प्रश्नों का उपसंहार ये है कि उपर्युक्त सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि शिक्षा का विकास हो और साक्षर बनाकर न छोड़ा जाए बल्कि शिक्षित बनाया जाए।

    डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- इतना करने से वस्तुस्थिति गम्भीरतर हो सकती है। अब भरपूर तरीक़े से जब तक जनता सड़कों पर नहीं उतरेगी, कुछ नहीं होनेवाला। सत्ता की राजनीति करनेवाले किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार बैठे हैं।