भ्रष्टाचार का मामला : जी०एस०आर०एम०एम०पी०जी० कॉलेज, लखनऊ में छात्रों से हो रही अवैध वसूली

विषय विसंगति से भरा, मन लेता है भेद

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मायावी संसार में, भाँति-भाँति के लोग।
पाप-घड़ा है भर रहा, यहीं करोगे भोग।।
दो–
जीवन रस की गागरी, कर लो छककर पान।
भाव-समादर है यहीं, मिलता भी अपमान।।
तीन–
यहाँ-वहाँ के भेद से, मन में होता खेद।
विषय विसंगति से भरा, मन लेता है भेद।।
चार–
विषय-वासना उर भरी, मन को करतीं थोर।
भरा हृदय में छल-कपट, सुलग रहा हर पोर।।
पाँच–
रूप-रूपसी विषभरी, मुख-मण्डल मुसकान।
सुखद-सलोना दिख रहा, काट रहे हैं कान।।

(आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-कृत ‘भाषा रस की गागरी’ से साभार उद्धृत; सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० जुलाई, २०२१ ईसवी।)

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